भवसागर से पार करता है सद्गुरु --- महात्मा नरसिंह दास जी

लखीमपुर खीरी , 654

महाकुंभ मेला प्रयागराज/ लखीमपुर।
सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद के तत्त्वावधान में प्लॉट नंबर 22, सेक्टर 18 हरिश्चंद्र चौराहा में सत्संग सुनाते हुए सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस के शिष्य महात्मा नरसिंह जी ने कहा भगवान की जीव के प्रति पहली कृपा है कि मानव योनि मिल गई । दूसरी भगवत् कृपा कि मानव योनि में ऐसी धारणा, ऐसी वृत्ति और ऐसी उत्प्रेरणा मिल गयी कि भगवत् प्राप्ति हो । यह मानव योनि इसलिये मिली है कि भवसागर पार करें । इसको नाव समझें, जहाज समझें, भोग की सामग्री नहीं। इस तन रूपी जहाज का खेवनिहार-मल्लाह-केवट सद्गुरु को यह शरीर सपर्पित कर दो। जब आप अपने तन रूपी नौका का खेवनिहार- मल्लाह सद्गुरु को समर्पित कर दोगे तो सद्गुरु आपको भोग के तरफ नहीं ले जायेगा। सद्गुरु आपको संसार में चौरासी लाख योनियों में नहीं जाने देगा। वह क्या करेगा कि --

 *करनधार सद्गुरु दृढ़ नावा । दुर्लभ साज सुलभ करि पावा ॥*

 जो भव सागर जीव के लिए पार करने में दुर्लभ था वह भगवदावतार (सद्गुरु) उसे आसानी से पार करा देगा । इस भव सागर से पार कराके आपको आसानी से मोक्ष को प्राप्त करा देगा । इसलिये मनुष्य की शरीर भोग की वस्तु न हो करके स्त्री-पुरुष, बेटी-बेटा को देने के लिए नहीं, बल्कि सद्गुरु को दे करके मोक्ष प्राप्त करने के लिये है।

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