श्रीचक्र पूजन का तत्त्वार्थ.. (श्रीपूर्णिमा विशेषांक)

लखीमपुर खीरी , 170

गुरु सत्यानन्द जी 
सनातन विद्या पीठ

(प्रस्तुति के0के0शुक्ला)

आद्याशक्ति त्रिपुरासुन्दरी ललिता की विमर्श शक्ति ही श्रीविद्या के गुरु रूप में प्रकट होती है। आदि गुरु नवनाथ हैं जिनका वास शरीरस्थ नव नाड़ियों में है, अर्थात् शरीरस्थ नव नाड़ियां नव नाथों का प्रतिनिधित्व करती हैं। 
  मनुष्य संसार मे जन्म लेकर जो भी ज्ञान प्राप्त करता है वह इन्ही नाड़ियों के द्वारा सम्भव है। ज्ञानेन्द्रियों के रूप में इन्ही नवों  की क्रियाशीलता से ज्ञानार्जन होता है। 
     दो कान और एक जिह्वा-- ये तीनों ही दिव्यौघ गुरु के प्रतिनिधि हैं।
    दो आंखे और लिंग -- ये तीनों सिद्धौघ गुरु का प्रतिनिधित्व करते हैं।
     दो नासा छिद्र और गुदा द्वार --  ये तीनों मानवौघ गुरु के प्रतिनिधि हैं।
    बलि देवियाँ कुरुकुल्ला -- ही 'अहम्' अस्तित्व की बोधक हैं, ये ही वाह्य जगत रूपी माया में जीव को मोहित कराती हैं । वे मां स्वरूपा हैं। 
     पञ्चमी -- वाराही विद्या पिता स्वरूप हैं, ये पुरुषार्थ अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्रदायिका हैं।
   यह शरीर ललिता लोक - अर्थात् मणिद्वीप है। इस देहरूपी नवरत्नमय द्वीप में -- तेज, वीर्य, मज्जा, हड्डी, मेद, मांस, रुधिर और त्वचा ही नवरत्न हैं। 
  चित्त मन के शंकल्प-विकल्प ही कल्पवृक्ष हैं। सुषुम्ना में स्थित छः शक्तियां - हाकिनी, शाकिनी, काकिनी, लाकिनी, राकिनी और डाकिनी ही संसार मे छः ऋतुएं - वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, शिशिर और हेमंत हैं। इन छः ऋतुओं के जनक इड़ा रूपी चंद्र और पिंगला रूपी सूर्य हैं। ग्रह, नक्षत्र, राशि के रूप में काल मनुष्य के आत्मा के पीछे सदा लगा रहता है। साधक जब साधना करते हैं तब ये सभी साधक के सम्मुख हो जाते हैं।
     'ज्ञाता' स्वयं मनुष्य है, 'ज्ञान' अर्घ्य है,  तथा बाहरी पूजनोपकरण से श्रीचक्र पूजन 'ज्ञेय' है। तीनों का एकीकरण ही वास्तविक श्रीयंत्रार्चन है, अर्थात परस्पर भिन्न प्रतीत होने वाले ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय को आत्मस्वरूप मानने पर ज्ञाता पूजक, ज्ञान, पूजोपकरण, तथा अर्घ्यादि ज्ञेय हैं। श्रीचक्र का पूजन तीनों का एकीकरण है। इन तीनों को अभिन्न मान कर पूजन करना ही उत्तम पूजन है।

 श्रीचक्र के भूपुर की पहली रेखा में अणिमा, लघिमा, महिमा, गरिमा, ईशित्व, वशित्व, प्राप्ति, प्राकाम्य, -- ये आठ, श्रृंगार आदि नव रस और नियति सिद्धि कुल दस सिद्धियां हैं। 
     द्वितीय चतुरस्र रेखा में पुण्य-पाप से सम्बद्ध विचार तरङ्ग के रूप मे ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी, चामुण्डा और महालक्ष्मीरूप में अष्टमातृकाएँ हैं। 
     तृतीय चतुरस्र रेखा में दस मुद्रा शक्तियां हैं जो सांसारिक आनंदों की मूर्तियां हैं।
     पञ्च महाभूत -- क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर; 
कर्षिणी, रसाकर्षिणी, गंधाकर्षिणी, चित्ताकर्षिणी, धैर्याकर्षिणी, स्मृत्याकर्षिणी, नामाकर्षिणी, बीजाकर्षिणी, आत्माकर्षिणी, अमृताकर्षिणी, शरीराकर्षिणी -- ये सभी यथानाम तथागुण वाली होती हैं। जैसे - कामाकर्षिणी काम (संभोग) का आकर्षण, बुध्याकर्षिणी बुद्धि का आकर्षण करती है।
     अनंगकुसुमा, अनंगमेखला, अनंगमदना, अनंगमदनातुरा, अनंगरेखा, अनंगवेगिनी, अनंगांकुशा एवं अनंगमालिनी--  ये आठ पद्मदल के तीसरे आवरण की शक्तियाँ हैं। ये सभी कर्मेन्द्रियों के दोषों को अवगत कराती हैं।
     कर्मेन्द्रियों के दोष -- भूख, प्यास, शोक, मोह, जरा, मृत्यु, वचन, आदान, विसर्ग, आनन्द, वात इत्यादि हैं।
     मानव शरीर मे जो चौदह प्रधान नाड़ियां हैं वही तुरीयावरण चतुर्दशार की चौदह शक्तियाँ है। 
    ये चौदह नाड़ियाँ हैं -- अलम्बुषा, कुहू, विश्वोदरी, वरुणा, हस्तिजिह्वा, यशस्वती, अश्विनी, गान्धारी, पूषा, शङ्खिनी, सरस्वती, इड़ा, पिंगला एवं सुषुम्ना। 
   चौदह शक्तियाँ है--  संक्षोभिणी, विद्राविणी, आकर्षिणी, आह्लादिनी, सम्मोहिनी, स्तम्भिनी, जृम्भिणी, वशङ्करी, रंजिनी, उन्मादिनी, सर्वार्थसाधिनी, सम्पत्तिपूरिणी, मन्त्रमयी एवं द्वंद्वक्षयंकरी। इनके नामों के अर्थानुसार विचार करने पर शरीर मे इनके कार्यों का ज्ञान होता है। 
     शरीरस्थ दस प्रकार की वायु बहिर्दशार की दस शक्तियाँ हैं। शरीरस्थ दस प्राण हैं-- प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनञ्जय। 
    दस देवियाँ हैं-- सिद्धिप्रदा, सम्पत्प्रदा, प्रियंकरी, मंगलकारिणी, कामप्रदा, दुःखविमोचिनी, मृत्युप्रशमनी, विघ्ननिवारिणी, सर्वांगसुन्दरी एवं सौभाग्यदायिनी। इनके नामों के अर्थ पर विचार करने पर इनके कार्यों का ज्ञान हो जाता है। 
   अन्तर्दशार की दस शक्तियां ही शरीरस्थ दस अग्निरूपा शक्तियां हैं। 
इनके नाम हैं -- सर्वज्ञा, सर्वशक्ति, ऐश्वर्यप्रदा, ज्ञानमयी, व्याधिविनाशिनी, आधारस्वरूपा, पापहरा, आनन्दमयी, रक्षास्वरूपिणी और इप्सितफलप्रदा।
    इनके दस प्रकार के आग्नेय कार्य हैं-- रेचक, पूरक, शोषक, दाहक, प्लावक, क्षारक, दारक, क्षोभक, मोहक, और जृम्भक। इससे सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख, तथा इच्छानुरूप गुणों के अनुभव होते हैं।
     गुण तीन हैं-- सत्व, राजस, और तमस ।
    अष्टार की अष्ट शक्तियां -- वशिनी, कामेश्वरी, मोदिनी, विमला, अरुणा, जयिनी, सर्वेश्वरी और कौलिनी  है। ये ही इनका अनुभव कराती हैं। 
    पंच तन्मात्राएँ -- शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ही कामदेव के पांच वाण हैं। मन इक्षु धनुष है। पाश राग है, द्वेष अंकुश है।
   त्रिकोण की तीन देवियाँ कामेश्वरी, वज्रेश्वरी और भगमालिनी ही महत्तत्त्व, अहंकार और अव्यक्त तत्त्व है। 
    अपनी आत्मा ही ललिता है, ललिता रूपी आत्मा ही विश्वविग्रह रूप में प्रकाशीत है। लाल रंग इसका विमर्श है।
   उपासना भावना है, अनन्य चित्तत्व सिद्धि है। मुद्रा इसका वैभव है। पूजनोपचार गति में भी तन्मयत्व भाव है।
स्वरूपभाव स्थैर्य है। प्रयोग इस आत्मा का विकल्प है। अपनी आत्मा का नाशक द्वेष है। यन्त्र-मन्त्र के साथ सदैव तथा सर्वत्र आत्मत्व ही साधना में स्थिरता लाता है। 
   तीनों संध्याओं में देवी के मन्त्र का जाप आदि-मध्य-अन्त स्नान है ।
   श्रीचक्र की अन्य शक्तियां विश्व विकल्प का कारण हैं। न्यास से आत्मदेह देवता के समान हो जाता है। जप के समय रूप भावना अर्थात् ध्यान में तन्मयता आती है।
     विश्व को अपने मे लीन करना 'होम' है। उसमें अन्योन्य भावना-भेद ही तर्पण है। 
मोह तथा अज्ञान जनित दुःख का इसप्रकार हवन से अन्त होता है। अभिषेक से विद्या तथा आत्मा का ऐक्य होता है।और साधक सबका आश्रय हो जाता है। उपदेश से मनुष्य उपाधि रहित हो जाता है। नाम कल्पित होता है। इसका सम्बन्ध शरीर से ही रहता है। आत्मा का कोई नाम और रूप नही होता। दक्षिणा से अभेद भाव होता है। सुश्रुषा-सेवा स्थिरता है।
    तिथिरूप से काल समय का अवलोकन होता है। तिथिरूप में सोलह नित्याएँ हैं। 
इन सोलह नित्याओं के नाम क्रमशः हैं-- कामेश्वरी, भगमालिनी, नित्यक्लीन्ना, भेरुण्डा, वह्निवासिनी, महावज्रेश्वरी, शिवदूती, त्वरिता, कुलसुन्दरी, नित्या, नीलपताका, विजया, सर्वमङ्गला, ज्वालामालिनी, चित्रा । इन पन्द्रह रूप में श्रीललिता इन्ही का कालतिथि स्वरूप है।
... शक्ति क्रीड़ा जगत सर्वम् 

Related Articles

Comments

Back to Top