'ऋते ज्ञानान्न मुक्ति:.. ज्ञान बिना मुक्ति नहीं।'
लखीमपुर खीरी Feb 05, 2025 at 06:26 PM , 122प्रस्तुति: के0के0शुक्ला
दैवीय शक्तियों या मानवेत्तर शक्तियों को भौतिक धरातल पर केन्द्रीभूत करने के लिए तीन मुख्य आधार हैं, जिन्हें तन्त्र में पीठासन कहते हैं।
पीठासन अर्थात्-- शक्ति-केंद्र।
प्रतिमा, मन्त्र और यंत्र-- ये तीनों पीठासन हैं जिनका सम्बन्ध साधक के नाभि, ह्रदय और मस्तिष्क - - इन तीनों शक्ति-केंद्रों से है।
इन तीनों पीठासनों द्वारा दैवीय शक्तियां मन आदि की शक्तियों से भिन्न लौकिक, पारलौकिक कार्य हेतु चेतन और सक्रिय हो उठती हैं।
प्रथम पीठासन में प्राण-शक्ति, दूसरे में प्राण और मनः-शक्ति और तीसरे में विचार-शक्ति कार्य करती है।
'पीठ विज्ञान' के रहस्यों के जानकार जानते हैं कि देव-प्रतिमा का निर्माण व प्राण-प्रतिष्ठा मन की अदृश्य शक्तियों को ध्यान में रख कर की जाती है और उसके अनुरूप प्रतिमा संबंधी ध्यान, श्लोकों, स्तोत्रों और उपासना-साधना पद्धतियों की रचना की जाती है। इसी तथ्य के आधार पर यंत्रों में वर्णाक्षरों, बीजाक्षरों का संयोजन, शब्दावलियों की रचना तथा यंत्रों में अंकाक्षरों की स्थापना की जाती है। इसके प्रणेताओं को हमारे शास्त्रकारों ने 'ऋषि' या 'मंत्रदृष्टा' के नाम से अभिहित किया है। ऋषियों ने समाधि की उच्चतम अवस्था में दैवी लोक में जुड़कर उन्हें प्राप्त किया था।
तंत्रशास्त्र में शक्ति-साधना:--
तंत्र-साधना के अनेक मार्ग हैं किन्तु उनमें चार ऐसे मार्ग हैं जिन्हें अति महत्व प्राप्त है।
ये चार मार्ग हैं-- शाक्त मार्ग, वाम मार्ग, कौल मार्ग और अघोर मार्ग। चारों मार्ग केवल कुछ महत्वपूर्ण क्रियाओं की दृष्टि से आपस में भिन्नता रखते हैं। लेकिन उनके उद्देश्य और सिद्धांत एक हैं। उनमें से किसी एक मार्ग पर चलने वाले साधक का एकमात्र लक्ष्य संसार-बंधन से मुक्ति और भौतिक जीवन में स्वतंत्रता की प्राप्ति होती है और उनका एकमात्र लक्ष्य होता है-- प्रवृत्ति' से 'निवृत्ति' की ओर अग्रसर होना।
आध्यात्मिक विचारधारा के अनुसार मानव जीवन का उद्देश्य है-- मानवीय स्तर से उठ कर दिव्यता की ओर अग्रसर होना जिसका तात्पर्य है पुरुष से पुरुषोत्तम और नर से नरोत्तम होना। प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर बढ़ना।
आध्यात्मिक साधना के दो मार्ग हैं-- योग मार्ग और तंत्र मार्ग। वे दोनों मार्ग बाहरी दृष्टि से अलग अवश्य प्रतीत होते हैं पर साधना-भूमि में दोनों एक दूसरे पर आश्रित हैं। तंत्र की जितनी भी क्रियाएँ हैं-- वे सभी योग-परक हैं।
'तन्त्र' शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत की 'तन्' धातु से हुई है जिसका अर्थ है- जिसके द्वारा अपनी चेतना का विस्तार किया जा सके और रक्षण किया जा सके-- वह प्रयास या उपाय तंत्र है। चेतना के विस्तार के क्रम में मनुष्य को अलभ्य ज्ञान की प्राप्ति होती है जो उसके लौकिक और पारलौकिक प्रयोजनों को सफल बनाती है।
'ऋते ज्ञानान्न मुक्ति:.. ज्ञान बिना मुक्ति नहीं।'































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