सच्चे ज्ञान में भगवान मिलते हैं और सच्चे भगवान से मोक्ष की प्राप्ति होती है --

लखीमपुर खीरी , 590

 गुरुओं से जनमानस रहे स्वयं सावधान_महात्मा दशरथ जी 
महाकुंभ नगर प्रयागराज/ लखीमपुर।
सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के सेक्टर 18, हरिश्चंद्र चौराहा, संगम लोअर मार्ग प्लॉट नंबर 22 में स्थित पंडाल में सत्संग सुनाते हुए सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस से तत्त्वज्ञान प्राप्त महात्मा दशरथ दास ने कहा  आज समाज में स्वार्थी और कपटी कालनेमी जैसे भी गुरु और सदगुरु बनकर जन समाज को अपने झूठे ज्ञान से दिग्भ्रमित कर रहे हैं, ऐसे झूठे गुरुओं के जाल से बचने के लिए जनसमाज को स्वयं ही सावधान होना रहना पड़ेगा, क्योंकि आध-अधूरे और झूठे ज्ञान से मनुष्य जीवन का मंजिल मुक्ति और अमरता का साक्षात् बोध कदापि सम्भव नहीं है, जीवन का परमलक्ष्य इससे प्राप्त नहीं हो सकता । आध-अधूरे ज्ञानोपदेश में ‘नीम हकीम खतरे जान’ वाली युक्ति लागू होती है । यह मानवीय शरीर (पिण्ड) इस सृष्टि की सर्वोंत्तम मशीन है जो परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान ने हम लोगों को अहैतु की कृपा कर अपने ही निजरूप को प्रदान किया है । सच्चे तत्त्ववेत्ता सद्गुरु से प्राप्त ‘तत्त्वज्ञान रूप भगवद्ज्ञान रूप सत्यज्ञान’ के अन्तर्गत कोई भी जिज्ञासु भक्त ‘सम्पूर्ण’ (संसार-शरीर-जीव-ईश्वर-परमेश्वर) को सम्पूर्णतया (शिक्षा-स्वाध्याय-योग साधना या अध्यात्म और तत्त्वज्ञान से) जानते हुये देख सकता है । सच्चा सद्गुरु अपने शिष्यों को वेद का तीनों सूत्र का सैद्धान्तिक और प्रायौगिक ज्ञान देकर अपनी अस्तित्त्व, मार्ग और मंजिल तीनों का स्पष्टतः बोध कराते हैं जैसे की- 
पहला सूत्र ‘असदोमासद्गमय’ (असत्य नहीं, सत्य की ओर चलें !)- जिसके अन्तर्गत कर्मप्रधान सांसारिक जीवन जीने वालों को पूर्ण गुरु या सद्गुरु सबसे पहले ‘जगन्मिथ्या’ अर्थात् यह जगत झूठा है-- को प्रायौगिक रूप से दिखाता है । यानी सद्गुरु शिष्यों को यह स्पष्टतः जना और दिखा देता है कि संसार और शरीर दोनों ही बिल्कुल मिथ्या है  फिर सत्य का बोध कराता है और संसार शरीर रूपी असत्य से सत्य की ओर ले चलता है ।
दूसरा सूत्र ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ (मोह-अन्धकार नहीं, दिव्य ज्योति की ओर चलें !) सच्चा  सद्गुरु जड़ जगत रूप मोह अन्धकार से बहिर्मुखी इन्द्रियों को आभ्यान्तर मुखी बनाते हुये अर्थात् जीव को शरीर व संसार के ममता, मोह, आसक्ति रूपी पतन विनाश व अन्धकार से मोड़कर आत्मा-ईश्वर-ब्रम्ह-सोल-नूर-स्पिरिट-सः ज्योति शिव को दिव्य दृष्टि से दिखाते हुये उससे जोड़ देता है । हालाँकि इस विधान से भी जीव को मुक्ति और अमरता की प्राप्ति नहीं हो पाती क्योंकि यह विधान से सिर्फ आत्मा-ईश्वर-ब्रम्ह की प्राप्ति होती है परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रम्ह की नहीं जो एकमेव एक मुक्ति-अमरताका दाता होता है । अतः मनुष्य जीवन के मुक्ति और अमरता रूप मोक्ष रूप चरम व परम उपलब्धि के प्राप्ति के लिये सद्गुरु अपने शिष्यों को तीसरे व अगले उपदेश के तरफ ले चलता है । 
तीसरा सूत्र ‘मृत्योर्माऽमृतं गमय’ (मृत्यु नहीं, अमरता के ओर चलें ! ) - सच्चे गुरु की पहचान सच्चे ज्ञान (तत्त्वज्ञान) के आधार पर होती है और सच्चा ज्ञान वह है जिसमें झाँकने पर चार अक्षर वाला विराट पुरुष रूप भगवान सामने ही दिखाई देता हो । भगवान् के सच्चे होने को तब स्वीकारें, जब उसमें सम्पूर्ण को सम्पूर्णतया (सारी सृष्टि जिसमें ब्रम्हा, इन्द्र और शंकर आदि-आदि भी सम्मिलित हैं, की उत्पत्ति, स्थिति व लय-विलय भी ) साक्षात् देखते हुये आमने-सामने ही बात-चीत सहित उनका परिचय-पहचान प्राप्त होता हो तथा उनमें मुक्ति और अमरता का साक्षात् बोध भी मिले। यदि ऐसा नहीं तो वह सच्चा भगवान नहीं और जब वह सच्चा भगवान नहीं तो वह ज्ञान सच नहीं और जब वह ज्ञान ही सच नहीं तो वह ज्ञानदाता गुरु भला कैसे सच हो सकता है ! सच्चे गुरु से सच्चा ज्ञान और सच्चे ज्ञान में सच्चा भगवान तथा सच्चे भगवान् से मुक्ति-अमरता का साक्षात् बोध तत्क्षण प्राप्त होता है । सच्चे भगवान वाले ज्ञान को ही तत्त्वज्ञान कहते हैं और तत्त्वज्ञानदाता को ही सद्गुरु कहते हैं । सब भगवत् कृपा ।

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