करोड़ों के जेवर गायब, मृतकों पर डाल दी जिम्मेदारी!
लखीमपुर खीरी Jun 18, 2026 at 06:42 PM , 25प्रेस नोट और कोर्ट रिकॉर्ड में अलग-अलग नाम, सदर मालखाना प्रकरण ने खड़े किए जांच पर सवाल
*लखीमपुर खीरी।* सदर मालखाने से करीब एक करोड़ रुपये मूल्य के जेवरात गायब होने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। पुलिस ने जांच बंद कर अंतिम रिपोर्ट लगा दी, लेकिन जिस तरीके से मामले को निपटाया गया उसने पूरी कार्रवाई को ही सवालों के घेरे में ला दिया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि करोड़ों के जेवर गायब होने का ठीकरा उन पुलिसकर्मियों पर फोड़ दिया गया है जिनका सालों पहले निधन हो चुका है।
*पुलिस का दावा: मृतकों के कार्यकाल में हुई गड़बड़ी*
पुलिस द्वारा जारी प्रेस नोट के अनुसार वर्ष 2007 के एक मुकदमे से जुड़े जेवरात तत्कालीन हेड मोहर्रिर चंद्रिका प्रसाद और बाद में तैनात रामबक्श पाल के कार्यकाल में मालखाने से गायब हुए। पुलिस का तर्क है कि दोनों कर्मचारियों की मृत्यु हो चुकी है, लिहाजा उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई संभव नहीं है। इसी आधार पर न्यायालय में अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर दी गई।
*कोर्ट रिकॉर्ड ने खोली विरोधाभास की परत*
मामले में नया मोड़ तब आया जब न्यायालयी अभिलेख खंगाले गए। कोर्ट में प्रस्तुत दस्तावेजों में तत्कालीन हेड मोहर्रिर के तौर पर रमाकांत तिवारी, मोल्हेराम, मेवाराम और ईश्वर दीन के नाम दर्ज हैं। जबकि पुलिस के प्रेस नोट में चंद्रिका प्रसाद और रामबक्श पाल का जिक्र है।
*सवाल नंबर-1: चार्ज किसके पास था?*
सबसे बड़ा सवाल यही है कि मालखाने का वास्तविक चार्ज किन कर्मचारियों के पास था। अगर कोर्ट रिकॉर्ड कुछ और कह रहा है और पुलिस प्रेस नोट कुछ और, तो सही तथ्य क्या हैं? क्या जांच के दौरान नए साक्ष्य मिले या रिकॉर्ड में ही भारी गड़बड़ी है?
*सवाल नंबर-2: 20 साल तक कैसे दबा रहा मामला?*
दूसरा गंभीर पहलू यह है कि अगर जेवरात 2007 के आसपास गायब हुए तो 18-20 साल तक किसी को भनक क्यों नहीं लगी? मालखाने में जमा मुकदमाती संपत्ति का नियमित ऑडिट और भौतिक सत्यापन क्यों नहीं हुआ? क्या इस दौरान किसी अधिकारी ने जांच नहीं की? अगर की तो करोड़ों के जेवर गायब होने की बात सामने क्यों नहीं आई?
*जवाबदेही पर उठे सवाल*
कानून के जानकारों का कहना है कि मालखाने की जिम्मेदारी किसी एक-दो कर्मचारी तक सीमित नहीं होती। यह पूरी संस्थागत व्यवस्था से जुड़ा मसला है। ऐसे में केवल मृतक कर्मचारियों पर जिम्मेदारी डालकर केस बंद कर देना कई आशंकाओं को जन्म देता है।
*चर्चा का विषय बना प्रकरण*
प्रेस नोट और न्यायालयी अभिलेखों में सामने आए विरोधाभास ने पूरे प्रकरण को और रहस्यमय बना दिया है। मामला भले ही अंतिम रिपोर्ट के साथ बंद कर दिया गया हो, लेकिन जवाबदेही, रिकॉर्ड की सच्चाई और जांच की पारदर्शिता पर उठ रहे सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं। जिले में अब यह चर्चा तेज है कि क्या करोड़ों के जेवर गायब होने की निष्पक्ष जांच हुई भी थी या मामले को दबा दिया गया?































Comments