शिशु वाटिका में मनाई गई भारत की प्रथम शिक्षिका सावित्रीबाई फुले की जयंती

लखीमपुर खीरी , 93

लखीमपुर खीरी।विद्या भारती विद्यालय सनातन धर्म सरस्वती शिशु वाटिका लखीमपुर खीरी में आज आज वंदना सभा में भारत की प्रथम शिक्षिका आदरणीया सावित्रीबाई फुले की जयंती दीप प्रज्जवलन एवं पुष्पार्चन कर मनाई गई। कार्यक्रम की संयोजिका सुश्री अंशिका तिवारी ने उनके जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उनका जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ था इनके पिता का नाम खन्दोजी नैवेसे और माता का नाम लक्ष्मीबाई था। सावित्रीबाई फुले का विवाह 1841में महात्मा ज्योतिराव फुले के साथ हुआ। सावित्रीबाई फुले भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल (भारत की प्रथम महिला शिक्षिका) और पहले किसान स्कूल की संस्थापक थी उनको महिलाओं और अनाथ दीन दुखी, गरीबों लोगों को शिक्षित करने के प्रयासों के लिए जाना जाता है। ज्योति राव, जो बाद में ज्योतिबा के नाम से जाने गए ज्योति बाई सावित्रीबाई के संरक्षक, गुरु और समर्थक थे ।सावित्रीबाई ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह जिया जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह करवाना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और महिलाओं को शिक्षित बनाना। कीचड़ पर पत्थर फेंक कर रोका गया घर से निकाला,पर स्त्री शिक्षा की ज्योत जलायें रखी साबित्री बाई फुले ने ।वे एक कवियत्री भी थी उन्हें मराठी की आदिकवित्री के रूप में जाना जाता था। विद्यालय की संचालिका श्रीमती हीरा सिंह ने बताया कि उन्होंने बहुत सी सामाजिक मुश्किलों का सामना किया  जब वे स्कूल जाती थी तो उनका विरोध होता था। सावित्रीबाई फुले पूरे देश की नायिका रही हर बिरादरी हर धर्म के लिए उन्होंने काम किया । शिक्षा के क्षेत्र में सावित्रीबाई फुले ने बहुत बड़ा योगदान किया। 5 सितंबर 1848 में पुणे में अपने पति के साथ मिलकर विभिन्न जातियों की नौ छात्राओं के साथ उन्होंने महिलाओं के लिए एक विद्यालय की स्थापना की। एक वर्ष में सावित्रीबाई और महात्माफुले पांच नए विद्यालय खोलने में सफल हुए। तत्काल उनके कार्य को देख कर सरकार ने उनको सम्मानित भी किया ।एक महिला प्रिंसिपल के लिए सन 1848 में बालिका विद्यालय चलाना कितना मुश्किल रहा होगा, इसकी कल्पना शायद आज भी नहीं की जा सकती ।लड़कियों की शिक्षा पर उसे समय सामाजिक पाबंदी थी। सावित्रीबाई फुले उसे दौर में न सिर्फ खुद पढ़ी ,बल्कि दूसरी लड़कियों के पढ़ने का इंतजाम भी किया। उनका निधन 10 मार्च 1897 को प्लग के कारण सावित्रीबाई फुले का निधन हो गया प्लेग  महामारी में सावित्रीबाई मरीजों की सेवा करती थी। प्लेग से  प्रभावित बच्चों की सेवा करने के कारण उनको भी यह बीमारी लग गई इसी कारण उनकी मृत्यु हो गई। सावित्रीबाई फुले पर साहित्य प्रकाशित  किया गया। इस अवसर पर समस्त शिक्षिका बहिनें एवं कर्मचारी भैया बहन उपस्थित रहे।

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