श्राद्ध क्या है और क्यों आवश्यक है.. गुरु सत्यानन्द सनातन विद्या पीठ
लखीमपुर खीरी Mar 02, 2025 at 09:50 PM , 119प्रस्तुति के0के0शुक्ला
लखीमपुर खीरी। पितरों के निमित्त विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धा से किया जाता है उसे श्राद्ध कहते हैं-- ‘श्रद्धया पितृन् उद्दिश्य विधिना क्रियते यत्कर्म तत् श्राद्धम्।’
श्रद्धा से श्राद्ध शब्द की निष्पत्ति होती है। अपने मृत पितृगण के निमित्त श्रद्धापूर्वक किये जानेवाले कर्म विशेष को 'श्राद्ध' के नाम से जाना जाता है। इसे ही 'पितृयज्ञ' भी कहते हैं। जिसका वर्णन धर्मशास्त्रों, पुराणों आदि में मिलता है।
महर्षि पराशर कहते हैं- 'देश, काल तथा पात्रमें हविष्यादि विधि द्वारा जो कर्म तिल(यव) और दर्भ (कुश) तथा मंत्रों से युक्त होकर श्रद्धापूर्वक किया जाए, वही 'श्राद्ध' है।
महर्षि वृहस्पति और श्राद्धतत्त्व में वर्णित महर्षि पुलस्त्य के अनुसार -- ‘ जिस कर्मविशेष में दुग्ध, घृत और मधु से युक्त सुसंस्कृत उत्तम व्यंजन को श्रद्धापूर्वक पितृगण के उद्देश्यसे ब्राह्मणादि को प्रदान किया जाए तब उसे 'श्राद्ध' कहते हैं।
ब्रह्मपुराण के अनुसार - ‘देश, काल और पात्र में विधिपूर्वक श्रद्धासे पितरों की तृप्ति के उद्देश्य से जो ब्राह्मण को दिया जाय, उसे श्राद्ध कहते हैं।
जो प्राणी विधिपूर्वक शान्तमन होकर श्राद्ध करता है, वह पापरहित होकर स्वर्ग का अधिकारी हो जाता है। प्राणी को अपने पितृगण की सन्तुष्टि सहित अपने कल्याण के लिए भी श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। संसार में श्राद्ध करने वाले के लिए श्राद्ध से श्रेष्ठ अन्य कोई कल्याणकारक उपाय नहीं है।
श्राद्धात् परतरं नान्यच्छ्रेयस्करमुदाहृतम्। तस्मात् सर्वप्रयत्नेन श्राद्धं कुर्याद्विचक्षणः।।
इतना ही नहीं श्राद्ध अपने अनुष्ठाता की आयु भी बढ़ाता है, पुत्र प्रदानकर अपने कुल-परम्परा को सुरक्षित करता है। धनधान्यादि परिपूर्ण करता। है, शरीर को निरोगी बलशाली बनाता है, दिग्दिगन्त में यशकीर्ति को प्रतिष्ठित करता है, श्रीसमृद्धि युक्त करते हुए सुख-शान्ति-समृद्धि प्रदान करता है।
श्राद्ध सांसारिक जीवन को तो सुखमय बनाता ही है, परलोक भी सुधारता है, अन्ततः जन्म-मृत्यु के भवचक्र से मुक्ति का मार्ग भी प्रदान करता है। श्राद्ध से सन्तुष्ट पितृगण श्राद्धकर्ता को दीर्घायु, सन्तति, धन, विद्या, राज्य, सुख, स्वर्ग आदि प्राप्ति के वर के साथ साथ मोक्षप्राप्ति का आशीर्वाद भी देते हैं।
आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च। प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितर: श्राद्धतर्पिताः।।
यहांतक कहा गया है कि जो श्राद्ध करता है, जो उसके विधि-विधान को जानता है, जो श्राद्ध करने को प्रेरित करता है और जो श्राद्ध का अनुमोदन करता है-- इनसबको श्राद्धकर्म का पुण्यफल मिलता है।
उपदेष्टानुमन्ता च लोके तुल्यफलौ स्मृतौ।। (वृहस्पति)
श्राद्ध क्यों आवश्यक है - यह तथ्य सर्वविदित है की मृत व्यक्ति अपना स्थूल शरीर तक नहीं ले जा सकता तब पाथेय (मार्ग का भोजन) कैसे ले जा सकता है? उससमय मृत व्यक्ति के सगे-सम्बन्धी श्राद्धविधि से उसके निमित्त जो कुछ देते हैं, वही उसको मिलता है। शास्त्र आज्ञा से मरणोपरान्त पिण्डदान का यही कारण है। मृतव्यक्ति के शवयात्रा अन्तर्गत छः पिण्डदान दिए जाते हैं, भूमि के अधिष्ठातृ देवताओं की प्रसन्नता तथा भूत-पिशाचोंद्वारा होने वाली बाधाओं का निराकरण आदि प्रयोजन सिद्ध होते हैं। इसके साथ दशगात्र में दिए जाने वाले दश पिण्डों के द्वारा जीव को आतिवाहिक सूक्ष्म शरीर की प्राप्ति होती है। यह मृतव्यक्ति के महायात्रा की प्रारम्भिक बात हुई। अब आगे उसे पाथेय की आवश्यकता पड़ती है, जो उत्तमषोडशी में दिए जाने वाले पिण्डदान से उसे प्राप्त होता है। यदि सगे-सम्बन्धी पुत्र-पौत्रादि श्राद्धपिण्डदान न करें तो भूखप्यास से उसे वहां बहुत दारुण दुख होता है, साथही श्राद्ध करने से प्रमाद करने वालों को भी पग-पग पर कष्ट का सामना करना पड़ता है। मृतप्राणि बाध्य होकर अपने श्राद्ध न करने वाले अपने सगे सम्बन्धियों का रक्त चूसने लगता है--
श्राद्धं न कुरुते मोहात् तस्य रक्तं पिबन्ति ते।
साथ ही वह श्राप भी देते हैं जो कालान्तर में पितृदोष के रुप मे सन्तति की जन्मपत्रिका में ग्रहीय पीड़ा के रूप में दृष्टिगोचर होता है।
पितरस्तस्य शापं दत्त्वा प्रयान्ति च।।
पश्चात् उस अभिशप्त परिवार को आजीवन कष्ट भोगना पड़ता है । कोई न कोई अभाव बना ही रहता है।
स्पष्ट परिलक्षित होता रहता है कि जैसे किसी का श्राप हमारा पीछा कर रहा हो। संतानहीनता, असामान्य विमारी, अकारण दरिद्रता, अकाल मृत्यु का सतत दुख, प्रेतावेश का बारम्बार प्रहार आदि और अंततोगत्वा मरणोपरांत नरकगति तक -- ये सब दोष पितृ का समुचित रूप में श्राद्धकर्म नही करने से प्राप्त होता है।
उपनिषद का आदेश है कि 'देवपितृकार्यभ्यां न प्रमदितव्यम्'। अर्थात् देवता तथा पितरों के कार्यों में कदापि प्रमाद नही करना चाहिए। प्रमाद से प्रत्यवाय होता है।






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