“योगी के एंटी-भूमाफिया अभियान को लखीमपुर में अफसरशाही का झटका? अनाथालय की 33 हजार वर्गफीट जमीन, कथित फर्जी बैनामे और 12 दिन से लंबित शिकायत”

लखीमपुर खीरी , 1

लखीमपुर में एंटी-भूमाफिया अभियान पर सवाल: 90 साल पुराने अनाथालय की जमीन पर कथित फर्जी बैनामे, 12 दिनों से CM पोर्टल पर कार्रवाई का इंतजार
 
 33 हजार वर्गफीट से अधिक बेशकीमती भूमि का मामला; हाईकोर्ट के स्थगन आदेश के बावजूद राजस्व कार्रवाई पर उठे सवाल
 अनुज कुमार शुक्ला

लखीमपुर-खीरी।
 
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार भू-माफियाओं के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति और त्वरित कार्रवाई का दावा करती है, लेकिन लखीमपुर-खीरी में सामने आया एक मामला इन दावों की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। जिला मुख्यालय स्थित संकटा देवी मेला रोड पर करीब 90 वर्ष पुरानी पंजीकृत धर्मार्थ संस्था **‘श्री जयेन्द्र बाल एवं महिला सदन’** की गाटा संख्या 1375 NZA की करीब **33,364 वर्ग फीट भूमि** को लेकर कथित फर्जी बैनामों और राजस्व अभिलेखों में दाखिल-खारिज की प्रक्रिया पर विवाद खड़ा हो गया है।
 
शिकायतकर्ता का आरोप है कि गैर-खातेदारों के माध्यम से कराए गए कथित अवैध बैनामों को रोकने के लिए एंटी-भूमाफिया पोर्टल पर शिकायत की गई, लेकिन स्थानीय स्तर पर मामले का निस्तारण वास्तविक तथ्यों और उपलब्ध न्यायिक दस्तावेजों के अनुरूप नहीं किया गया।
 
### जांच में दिए गए दस्तावेज, फिर भी आख्या में नहीं आया उल्लेख
 
शिकायत के अनुसार, संस्था की भूमि को सुरक्षित रखने के लिए एंटी-भूमाफिया पोर्टल पर **संदर्भ संख्या 41015326000191** के तहत शिकायत दर्ज की गई थी। इसमें मांग की गई थी कि कथित गैर-खातेदारों द्वारा कराए गए बैनामों के आधार पर नगर पालिका और राजस्व अभिलेखों में होने वाली दाखिल-खारिज की कार्रवाई पर रोक लगाई जाए।
 
शिकायतकर्ता का कहना है कि स्थलीय जांच के दौरान संबंधित लेखपाल को वर्ष **1938 का पंजीकृत पट्टा**, वर्ष **1952 के न्यायिक वाद का निर्णय**, कथित अवैध बैनामों की सूची तथा उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में लंबित मामले **A227 No. 4440/2026** से संबंधित प्रभावी स्थगन आदेश समेत अन्य दस्तावेज लिखित बयान के साथ उपलब्ध कराए गए थे।
 
इसके बावजूद शिकायतकर्ता के मुताबिक जांच आख्या में इन महत्वपूर्ण दस्तावेजों और न्यायिक आदेश का समुचित उल्लेख नहीं किया गया। आख्या में कथित तौर पर यह कहा गया कि *“आवेदिका बैनामा निरस्त कराना चाहती है, तहसील स्तर से कार्रवाई अपेक्षित नहीं है।”*
 
यही बिंदु अब पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल बन गया है कि यदि भूमि से संबंधित न्यायिक आदेश और पुराने राजस्व दस्तावेज जांच के दौरान उपलब्ध कराए गए थे, तो उनका परीक्षण और उल्लेख जांच आख्या में किस आधार पर नहीं किया गया?
 
### नकारात्मक फीडबैक के बाद भी 12 दिन तक नहीं हुआ री-ओपन
 
शिकायतकर्ता ने कथित भ्रामक जांच आख्या के खिलाफ **1 सितंबर** को जनसुनवाई/पोर्टल पर **2-स्टार नकारात्मक फीडबैक** दर्ज कर पुनः जांच की मांग की।
 
शिकायतकर्ता का आरोप है कि नकारात्मक फीडबैक दर्ज होने के बावजूद **12 सितंबर तक संदर्भ पर दोबारा कार्रवाई नहीं की गई** और पोर्टल पर ‘फीडबैक पर कार्यवाही’ शून्य बनी रही।
 
प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई न होने से परेशान होकर शिकायतकर्ता को एक बार फिर मुख्यमंत्री पोर्टल पर **संदर्भ संख्या 40015326049815** के माध्यम से शिकायत दर्ज करानी पड़ी।
 
### हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद दाखिल-खारिज पर रोक का सवाल
 
पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर पहलू कथित तौर पर उच्च न्यायालय के स्थगन आदेश से जुड़ा है। शिकायतकर्ता का कहना है कि न्यायालय का प्रभावी आदेश जांच अधिकारी के संज्ञान में लाया गया था। ऐसे में सवाल उठता है कि न्यायालय के आदेश की वास्तविक स्थिति का परीक्षण किए बिना शिकायत को केवल ‘बैनामा निरस्तीकरण’ का विवाद मानकर तहसील स्तर पर कार्रवाई से पल्ला झाड़ना कितना उचित है।
 
यदि न्यायालय का आदेश प्रभावी है, तो उससे संबंधित राजस्व कार्रवाई में अधिकारियों की भूमिका और जिम्मेदारी स्पष्ट किए जाने की आवश्यकता है। वहीं यदि आदेश का इस मामले पर प्रभाव नहीं है, तो प्रशासन को इसका स्पष्ट कानूनी आधार सार्वजनिक करना चाहिए।
 
### भू-माफिया के खिलाफ सरकार की नीति बनाम स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली
 
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार की एंटी-भूमाफिया मुहिम का मूल उद्देश्य सरकारी, सार्वजनिक और धर्मार्थ संस्थाओं की भूमि को अवैध कब्जों और भू-माफियाओं से बचाना है। ऐसे में किसी पंजीकृत धर्मार्थ संस्था की बेशकीमती भूमि से जुड़े मामले में शिकायत के निस्तारण की प्रक्रिया पर सवाल उठना प्रशासन के लिए गंभीर विषय है।
 
शिकायतकर्ता का आरोप है कि स्थानीय राजस्व तंत्र की निष्क्रियता से कथित भू-माफिया तत्वों को लाभ मिल सकता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र प्रशासनिक जांच और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना अभी बाकी है।
 
### अब शासन से कार्रवाई की उम्मीद
 
मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि **क्या मुख्यमंत्री पोर्टल पर नकारात्मक फीडबैक के बावजूद 12 दिनों तक कार्रवाई न होने की जिम्मेदारी तय होगी?** क्या कथित रूप से महत्वपूर्ण दस्तावेजों को नजरअंदाज करने वाली जांच आख्या की दोबारा जांच कराई जाएगी? और क्या हाईकोर्ट के कथित स्थगन आदेश के प्रकाश में भूमि से संबंधित राजस्व कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट की जाएगी?
 
यदि शिकायतकर्ता के आरोप और उपलब्ध दस्तावेज सही पाए जाते हैं तो यह केवल एक भूमि विवाद नहीं, बल्कि **जनसुनवाई व्यवस्था, राजस्व प्रशासन और एंटी-भूमाफिया अभियान की विश्वसनीयता** से जुड़ा मामला बन जाता है।
 
अब निगाहें शासन और जिला प्रशासन की अगली कार्रवाई पर हैं। निष्पक्ष जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि अनाथालय की भूमि के मामले में लापरवाही हुई, प्रक्रिया का पालन किया गया या फिर किसी पक्ष को अनुचित लाभ पहुंचाने की कोशिश हुई।

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