*एकाक्षर ब्रह्म प्रणव 'ॐ' आराधना ..*

लखीमपुर खीरी , 198


गुरु सत्यानन्द जी 
सनातन विद्या पीठ

(प्रस्तुति के0के0शुक्ला)
प्रणव मन्त्र ॐकार को कहते हैं। इस त्रिमात्रक ॐ में समस्त मन्त्र समाहित हैं । ॐ को चतुर्थ मात्रक भी कहा गया है और सप्त मात्रक भी । चतुर्थ मात्रक ॐ को अ, उ, म् और बिन्दु वाला तथा सप्तमात्रक ॐ को   अ, उ, म्, विन्दु, नाद, शक्ति और शान्त ' नामक 7 मात्राओं वाला कहा गया है। यहाँ एक तथ्य महत्त्व का है की म् मे ही बिन्दु की युति स्वीकार करते हुए आचार्य शंकर ॐ को त्रिमात्रक कहते हैं और बिंदु में ही नाद, शक्ति और शान्त को भी युत मानते हैं। 
     यद्यपि मन्त्र अनगिनत हैं और उनकी सम्यक साधना से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन भिन्न-भिन्न मन्त्रों में भिन्न-भिन्न उद्देश्यों की प्रधानता होती है। सामान्यतया सभी मन्त्र काम प्रधान हैं किन्तु ' प्रणव ' मन्त्र मोक्ष-प्रधान है। 
     ' प्रणव ' मन्त्र के ऋषि प्रजापति, छन्दस् आदिगायत्री तथा देवता स्वयं परमात्मा हैं। प्रणव मन्त्र का बीज 'अं' तथा शक्ति 'उं' है। अंगन्यास के लिए अंतिम व्याहृति सत्य को छोड़ कर शेष छः व्याहृति का प्रयोग करते हैं। 
     प्रणव की उपासना में वैष्णवपीठ पर भगवान् विष्णु की पञ्चावरणीय आराधना करनी चाहिए । प्रणव साधना में योग साधना अवश्य करणीय है। काम, क्रोध, लोभ मोह, मद, मात्सर्य-- ये छः योग साधना मार्ग के प्रबल बाधक हैं। अष्टांग योग का सहारा ले कर इन छः बाधाओं की निवृत्ति करनी चाहिए। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा ध्यान और समाधि -- ये योग के क्रमिक सोपान हैं।
     अब ॐकार की कला का वर्णन करते हैं-- 
  ॐ की पचास कलाएं वर्णित हैं, जिनके माध्यम से प्राणायाम में सफलता प्राप्त होती है। ॐकार के 'अ' से उत्पन्न सृष्टि, ऋद्धि, स्मृति, मेधा, कान्ति, लक्ष्मी, धृति, स्थिरा, स्थिति और सिद्धि । 'उ' से उत्पन्न ज़रा, पालिनी, शान्ति, ऐश्वरि, रति, कामिका, वरदा, ह्लादिनी, प्रीति तथा दीर्घा । 'म' से उत्पन्न तीक्षा, रौद्री, भया, निद्रा, तंद्रा, क्षुत्, क्रोधिनी, क्रिया, उत्कारी तथा मृत्यु नामक दस-दस कलाओं, 'विंदु' से उत्पन्न पीता, श्वेता, अरुणा तथा असिता एवं 'नाद' से उत्पन्न निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ति, इन्धिका, दीपिका, रेचिका, मोचिका, परा, सूक्ष्मा, सूक्ष्मामृता, ज्ञानामृता, आप्यायनी, व्यापिनी, व्योमरूपा तथा अनन्ता नामक सोलह कलाओं का ग्रहण किया जाता है। इन पचास मात्राओं से प्राणों की धारणा करने से शरीर के विभिन्न अवयवों में स्थित पचास मातृकाओं, इन मातृकाओं से सम्बंधित पंचभूतों और समस्त पाँचभौतिक ब्रह्माण्ड का संयमन या धारणा हो जाती है ।
      योगसाधक को चाहिए कि वह क्रमशः मूलाधार में प्रणव ' ॐ ' , प्रणव में स्थित विन्दु और विन्दु में स्थित नाद का चिंतन करते हुए ॐकार का उच्चारण करके उस ॐकार के नाद को सुषुम्णा में प्रविष्ट करें। पश्चात सुषुम्णा के भीतर अतिसूक्ष्म तन्तु के समान समस्त संसार के मूल शब्दब्रह्म के अंश रूपी ॐकार के तेजस रूप का ध्यान करें । 
     इस प्रणव के ॐकार, गुणबीज, प्रणव, तार, ध्रुव, वेदादि, अ-आदि, उ-मध्य, म-पर तथा त्रिमात्रक -- ये दश नाम हैं ।

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