संतानहीनता, शाप प्रकरण और उसका ज्योतिषीय संबंध 2 गुरु सत्यानन्द जी

लखीमपुर खीरी , 115

(प्रस्तुति के0के0शुक्ला) 
शाप योग का वर्णन ...
सर्पदोष :-  
      १. जिस जातक के जन्मांग में राहु मंगल की राशि का होकर पंचमस्थ हो या मङ्गल से युत/दृष्ट हो । तब जातक के अपुत्र योग का कारण सर्पदोष होता है ।
      २. पंचमेश राहु युत हो, शनि पंचमस्थ हो, शनि चन्द्रमा से युत/दृष्ट हो तब सर्प दोष होता है ।
      ३. पुत्रकारक राहु युत हो, पंचमेश बलहीन हो और लग्नेश मङ्गलयुत हो तब सर्प दोष निर्मित होता है।
      ४.  पंचमेश त्रिक (६, ८, १२) में हो, पुत्रकारक मङ्गलयुत हो और राहु लग्नस्थ हो तब सर्पशाप से अपुत्रयोग निर्मित होता है। 
      ५. स्वराशि में मङ्गल के साथ पंचमेश और बुध हो, लग्न में राहु और गुलिक हो तब सर्पशाप माना जाता है।
     ६.  राहु मङ्गल की राशि का होकर पंचमस्थ हो साथ ही शुभ दृष्ट हो तब सर्पदोष निर्मित होता है। 
    ७. राहु, गुरु, बुध, सूर्य, मङ्गल शनि पंचमस्थ हों, पंचमेश और लग्नेश बलहीन हों तब सर्पशाप होता है।
    ८. राहु लग्नेशयुत हो, मङ्गल पंचमेश युत हो और पुत्रकारक केतु युत हो तब सर्पशाप से पुत्र नाश होता है। 

सर्पशाप शांति विधान....
    १. सर्पशाप शान्ति के लिए सर्प का वैदिक मन्त्रों से प्रतिष्ठा और पूजन कराएं। 
    २. गौ, धरती, सुवर्ण, तिलपात्र सर्प पूजन पश्चात दान करें।
    ३. सर्प मन्त्रों का तांत्रिक अनुष्ठान भी शाप निर्मूलन में समर्थ होता है। दोष शान्ति पश्चात संतान प्राप्ति होती है।
सर्प शाप शांति पश्चात संतानप्रद याग भी करना सफलता को सुनिश्चित करता है। 
            ........ॐ.......
     अब पितृ शाप प्रकाशित करने वाले योगों का वर्णन करते हैं -- 
पितृ शाप योग :- 
       १. सूर्य नीच या शनि की राशि का होकर पंचमस्थ हो या पंचमस्थ होकर पाप पीड़ित हो तब पितृशाप का संकेत होता है । 
      २. जिनके जन्मांग में सूर्य ओर पंचमेश पाप मध्य में हों और नवम, पंचम में पाप ग्रह हों तब पितृदोष के कारण अपुत्र योग होता है।
      ३. गुरु सूर्य राशि का होकर पंचमस्थ हो, सूर्य पंचमेश के साथ हो, लग्न और पञ्चम भाव पाप ग्रह युत हो, तब पितृ दोषनिर्मित होता है ।
     ४. बलहीन लग्नेश पंचमस्थ हो, पंचमेश पाप पीड़ित होकर त्रिक (६, ८, १२) में हो । लग्न और पञ्चम भाव पाप प्रभाव में हो । तब पितृ शाप की पुष्टि होती है।
     ५. जब दशमेश पंचमस्थ हो और पंचमेश दशमस्थ हो, लग्न और पञ्चम भाव पाप प्रभावित हो। तब पितृशाप वश पुत्रशोक प्राप्त होता है।
     ६. पंचमेश, दशमेश और भौम संयुक्त होकर दशम, पंचम या लग्न में स्थित हो तब पितृ शाप के कारण अपुत्रता होती है।
    ७. पुत्रकारक ग्रह पापराशिस्थ हो, दशमेश त्रिकस्थ हो और लग्नेश पापयुत होकर लग्नस्थ हो तब पितृशाप से पुत्र नाश होता है । 
    ८. लग्न, पञ्चम में सूर्य, शनि, भौम स्थित हो और द्वादश, अष्टम में राहु, गुरु हों तब उस प्राणि को पितृ दोष के कारण संतान शोक प्राप्त होता है। 
    ९. सूर्य अष्टमस्थ हो, शनि पंचमस्थ हो, पंचमेश राहु युत हो और लग्न में पापी ग्रह हों तब पितृशाप से संतानहीनता होती है। 
    १०. व्ययेश लग्नस्थ हो, अष्टमेश पंचमस्थ हो और दशमेश अष्टमस्थ हो तब पितृदोष के कारण पुत्रनाश होता है। 
    ११. षष्ठेश पंचमस्थ हो, दशमेश षष्ठस्थ हो और पुत्रकारक पाप पीड़ित हो तब भी पितृ शाप निश्चित होता है। 
        अतः पितृ शाप का समुचित विवेचन संपन्न हो जाने पर पितृ शाप के शान्ति का विधान प्रकाशित करना चाहिए । 
पितृदोष शान्ति विधान :-
      पितृदोष प्रकाशित होने पर पितृश्वरों का विधिवत् श्राद्ध करना चाहिए और 'अष्टाक्षर' मन्त्र का अनुष्ठान करना चाहिए।  सम्यक हवन और दान द्वारा पितरों को तृप्त करना चाहिए। स्वर्ण दान और कन्या दान का विशेष महत्त्व है। पितृ श्राद्ध संपन्न करके ही कन्याविवाह और यथाशक्ति स्वर्णदान में प्रवृत होना उचित होता है। पितरों की तृप्ति ही एक मात्र इस दोष से निवृत्ति का उपाय है । 
      हमे अपने जीवित वृद्धों को भी प्रसन्न करके आशीर्वाद लेते रहने से हमारी आने वाली सन्तति के जन्मांग में पितृदोष निर्मित नही होने पाता । इस महत्वपूर्ण तथ्य का हम सभी को सर्वदा स्मरण रखना चाहिए । हमारे कुल के आज के जीवित वृद्ध ही हमारी आने वाली पीढ़ी के पितर हैं। हम अपने कुल वृद्धजन का अभी आदर करेंगे तब ही हमारी संतति हमारा आदर करने वाले संस्कार से युक्त उत्पन्न होगी और यह कार्य हमारे कुल के पितृ ही अपने आशीर्वचन द्वारा संपन्न करते है ।
       वृद्धजन का आशीर्वचन ही हमारी उत्तम और संस्कारी संतति के आने का अनुमोदन होता है। इस तथ्य में किसी को कोई संदेह नही होना चाहिए । यह तथ्य मानव की सभी सभ्यताओं और संस्कृतियों में किसी न किसी रूप में स्वीकार्य है। 
..........ॐ...........

Related Articles

Comments

Back to Top