उत्तम संतान प्राप्ति हेतु आवश्यक गर्भाधान संस्कार:— अनिवार्यप्रकरण………….

लखीमपुर खीरी , 202

(प्रस्तुति के0के0शुक्ला)
समाज में ज्यों ज्यों  संस्कारहीनता व बदलाव आता गया त्यों त्यों लोग संस्कारों को भूलने लगे जैसा की सर्व विदित है कि शास्त्रों के विधान में 16 संस्कार बताए गए हैं इसी में एक आवश्यक संस्कार गर्भाधान संस्कार भी है परंतु आज के समय मे शायद ही कोई संतान गर्भाधान संस्कार से युक्त हो कर धरती पर पदार्पण करती हो। दैव योग की इसमे गणना नही है। आधुनिकता के नाम पर संस्कारहीन, मिथ्या, आडम्बरप्रिय, भोग लोलुप समाज का निर्माण और प्रसार तीव्र गति से हो रहा है। जिसका परिणाम दारुण एवम अन्तहीन शारीरिक- मानसिक दुख-कष्ट के रूप मे समाज मे देखने को मिल रहा है।
हमारे ऋषि- मुनियो ने योग्य, विद्वान,... निरोग, आज्ञाकारी, यशस्वी एवम दीर्घजीवी संतानोत्पत्ति हेतु गर्भाधान संस्कार को प्रकाशित किया। वर्तमान समय मे इसकी बहुत आवश्यकता है। सर्वथा योग्य संतान प्राप्ति हेतु यह अचूक प्रयोग है। जिन दम्पत्ति को संतान प्राप्ति मे बाधा आ रही हो उनके लिए यह वरदान ही है। गर्भाधान हेतु समागम काल मे मात्र शारीरिक सुख नही अपितु सुयोग्य, स्वस्थ, सुंदर सर्वगुणसम्पन्न संतति की कामना की जानी चाहिए।
ऋतुकाल आरम्भ होने के पांचवे दिन से लेकर सोलहवे दिन के मध्य अपने और अर्धांगिनी के अनुकूल शुभ मुहुर्त मे ही गर्भाधान संस्कार का आयोजन करना चाहिए। रजस्वला स्त्री को हस्त, स्वाती, अश्विनी, मृगसिरा, अनुराधा, धनिष्ठा, तीनो उत्तरा, रोहिणी और ज्येष्ठा इन ग्यारह नछ्त्रो मे एवम 2, 3, 5, 7, 11, 12, 13 इन सात तिथियो मे और सोम, बुध, गुरु, शुक्र इन चार वारो मे स्नान करना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस दिन मे सम्मिलित रुप मे उपरोक्त वार, तिथि, नछ्त्र हो तो रजस्वला पश्चात स्नान गर्भाधान हेतु उत्तम कहा गया है। शुभ मुहुर्त का स्नान गर्भाधान की बाधाओ के निवारण मे सहायक होता है।
गर्भाधान संस्कार मे तिथि गंडांत, लग्न गंडांत एवम नछत्र गंडांत, ताराओ मे बध और जन्म तारा ( जन्म नछत्र से 7, 10, 16, 19, 25वा नछत्र) मूल, भरणी, अश्विनी, रेवती और मघा ये नछत्र सूर्य और चंद्र ग्रहण काल, ब्यतिपात एवम वैधृती योग, माता- पिता के श्राद्ध का दिन, दिन मे सम्भोग, परिध योग कापूर्वार्ध, उत्पात से दुषित नछ्त्र, जन्म राशि से आठ्वी राशि का लग्न एवमपाप ग्रह युत लग्न इन सबका परित्याग कर देना चाहिए। भद्रा, करण, षष्ठी, पर्व दिन, रिक्ता तिथि, संध्या बेला और मंगल, शनि, रवि वार गर्भाधान हेतु वर्जित काल कहे गये हैं।
शुभ काल ----- नछत्रो मे तीनो उत्तरा, मृगशिरा, हस्त, अनुराधा, रोहिणी, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा एवमशतभिषा ये ग्यारह नछत्र गर्भाधान हेतु उत्तम माने गये है। चित्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्विनी इन चार नछत्रो मे किया हुआ गर्भाधान मध्यम होता है। रजोदर्शन के पश्चात 5, 8, 9, 10, 12, 14, 15, 16वी रात्रि उत्तम तथा 6वी 7वी रात्रि मध्यम होती है। वार मे सोम, बुध, गुरु, शुक्रवार उत्तम होता है। तिथियो मे 1, 2, 3, 5, 7, 10, 11, 12, 13वीं तिथि शुभ कही गयीहै। शुभ समय निर्धारण हेतु विहित तिथि, वार, नछत्र और रजोदर्शन पश्चातरात्रि संख्या के साथ ही निषेध काल का भी ध्यान रखते हुए गर्भाधान संस्कार सम्पन्न करना चाहिए। पुत्र प्राप्ति की कामना वाले दम्पति को सम रात्रि (6, 8, 10, 12, 14, 16वीं) में तथा पुत्री प्राप्ति की कामना वाले दम्पति को विषम रात्रि (5, 7, 9, 15वीं) में समागम करना चाहिये। इन रात्रियों मे यदि वर्जित मुहुर्त का योग उपस्थित हो रहा हो तो गर्भाधान संस्कार का कार्य नही करना चाहिये, कारण कि उस काल मे तामसिक जीवात्माओं का प्रभाव बहुत बढ़ जाता है और गर्भ मे उनके प्रविष्ट होने की सम्भावना बन जाती है परिणामतः आसुरी संतान का आगमन हो जाता है। यदि सम्भव हो तो आधान लग्न का भी विचार अवश्य करना चाहिये। आधान लग्न का समय औसत 2 घंटे का होता है। शुभ आधान लग्न का निर्धारण करने के लिये कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिये। आधान लग्न की शुभ ग्रहों से युति हो, हो, केंद्र तथा त्रिकोणमे शुभ ग्रह हों, ,त्रि-षड-आय मे पाप ग्रह हों, साथ ही उपरोक्त मुहुर्त का भी सुयोग उपस्थित हो तो ऐसे सुयोग मे संस्कारित गर्भ मे आवाहित जीवात्माअवश्य ही स्वयं के लिये, परिवार, समाज साथ ही राष्ट्र के लिये कल्याणकारीहोगी........ भगवत कृपा हि केवलम..

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