आवश्यकता, महत्व और कर्मवाद.

लखीमपुर खीरी , 102

ॐ तत्सत् 

ज्योतिष - आवश्यकता, महत्व और कर्मवाद.. 

गुरु सत्यानंद जी

सनातन विद्यापीठ 

 

प्रस्तुति के0के0शुक्ला 

 

 सनातन ज्ञान अंतर्गत शरीर धारण करने वाली जीवात्मा अमर है.. इसका कभी नाश नहीं होता। केवल कर्मों के अनादी प्रवाह.. प्रभाव ..  परिणाम स्वरुप जीवात्मा अनेकानेक योनियों में विचरता रहता है |

  सम्पूर्ण कर्म को तीन भागो में क्रमश: वर्णित करते हैं | 

संचित कर्म, प्रारव्ध कर्म और क्रियमाण कर्म |

  संचित कर्म :-- किसी के द्वारा वर्तमान क्षण तक किया गया कर्म चाहे.. वो इस जन्म का हो या जन्मान्तर का ..  संचित कर्म कहलाता है |

  प्रारब्ध :- संचित कर्म का वह भाग जिसका फल हमें भोगने के लिए मिल रहा है या मिलने के क्रम  में है .. प्रारब्ध कहलाता है |

 क्रियमाण :-- वर्तमान में हम जो कर्म कर रहे हैं या करने के क्रम मे हैं | वह हमारा क्रियमाण कर्म     कहलाता है | यह क्रियमाण ही संचित कर्म में परिणत होता जाता है | जो कालांतर में प्रारब्ध बन कर भोग हेतु प्रकृति द्वारा प्रस्तुत  किया जाता है |

      अनेकानेक जन्म-जन्मान्तरों के संचित कर्म फल को एक साथ भोगना संभव नही है | कारण कि परस्पर विरोधी कर्मों के परिणाम रूप फल परस्पर विरोधी होने के कारण भोग की तारतम्यता का खंडन कर देंगे | जो प्रकृति के नियम के अनुरूप नही है | अतः इन्हें क्रमिक रूप में ही भोगा जाता है | 

     क्रियमाण कर्म के अधिष्ठान में संचित और प्रारव्ध की सर्वप्रमुख भूमिका होती है किन्तु कर्म करने या नही करने या कर्म में संशोधन का अधिकार कर्ता के लिए सुरक्षित है |  क्रियमाण कर्म में जीव के कर्तापन के अधिकार के कारण ही जीव भोक्ता हो जाता है |

मनुष्य को वर्तमान जीवन में जो कुछ भी मिल रहा है, कर्म के नियमों के द्वारा सुनिश्चित व सुनियोजित है | एक बार कर्म करके मनुष्य उसका फल अनिवार्य रूप में अवश्य पायेगा | यद्यपि कर्म करने में ( क्रियमाण ) मनुष्य अपने आप में स्वतंत्र है | 

 

  ज्योतिष शास्त्र में इन त्रिविध कर्म फल के विचार के लिए तीन  अलग अलग पद्धतियों का आश्रय लिया जाता है | फलित शास्त्र में संचित कर्म फल विचार के लिए आधान कुंडली एवं जन्म कुंडली एवं उसमे निर्मित योगों के समुचित विश्लेषण द्वारा, प्रारव्ध के फल का विचार ग्रहों के दशाओं द्वारा...  तथा क्रियमाण के फल का विचार ग्रह गोचर एवं प्रश्न कुंडली द्वारा किया जाता है | 

  प्रारव्ध के फल विचार में संचित के फल की उपेक्षा नही की जा सकती | यहाँ क्रियमाण की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है | अतः जातक के कर्म फल विचार में जन्म कुंडली अंतर्गत ग्रह योग..  दशा अन्तर्दशा .. गोचर एवं प्रश्न कुंडली ... इन सबका सम्यक रूप में अध्ययन करना आवश्यक है | तभी संतोष जनक परिणाम प्राप्ति की आशा की जा सकती है |.. क्रमशः ......

भगवत्कृपा ही केवलम्

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