जीते जी समाज कल्याण अधीक्षिका को नहीं मिला इंसाफ मरने के बाद उत्तराधिकारी काट रहे 10 वर्ष से चक्कर कारनामा समाज कल्याण उत्तराखंड व यूपी

लखीमपुर खीरी , 315

के0के0शुक्ला
लखीमपुर/हरिद्वार। सबका कल्याण करने का ठेका लिखाए अर्थात् कल्याण का दावा करने वाले विभाग यानी समाज कल्याण विभाग शायद अपने कार्मिकों एवं उनके आश्रितों का ही कल्याण करने में कितना फिसड्डी और संवेदनहीन है जिसका जीता जागता प्रमाण यह प्रकरण है जिसमें विभाग में कार्यरत अधीक्षिका को उस गलत बात का विरोध करने का दंड भुगतना पड़ा जो गलती सचिवालय ने की थी और दो प्रदेशों के अफसरों की खींचातानी में उसे वर्षों तैनाती और वेतन नहीं मिला और धनाभाव के चलते नौ वर्ष पहले समुचित इलाज के अभाव में उसकी मृत्यु हो गई उसकी मृत्यु के उपरांत उसके उत्तराधिकारी हरिद्वार देहरादून में बैठे समाज कल्याण अधिकारियों एवं निदेशालय की परिक्रमा कर रहे हैं परंतु उन्हें अभी तक मृतक के देयकों का भुगतान नहीं किया गया है और ना ही सेवा काल में मृत्यु होने के कारण आश्रित परिजनों में किसी को अनुकंपा के आधार पर मिलने वाली नौकरी का लाभ ही दिया गया है। 
  शहर के मोहल्ला हाथीपुर निवासी प्रकाश चंद्र वर्मा ने बताया कि उनकी छोटी बहन कुमारी उमा वर्मा समाज कल्याण विभाग के जन जाति विकास में अधीक्षिका के पद पर 1990 से कार्यरत थी बाद में उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड अलग होने पर वह दो प्रदेशों के अधिकारियों के बीच फुटबॉल बन गई और विभागीय कार्मिकों ने उन्हें बिना विवाह किये ही श्रीमती का दर्जा दे दिया जो उनकी और उनके परिजनों की तमाम कोशिशें के बाद आज भी बरकरार है। फुटबॉल बनने के बाद ना तो उन्हें ठीक से तैनाती दी गई और ना ही उनका वेतन आहरित किया गया।
 इस मामले में विभाग ने हाईकोर्ट व सरकार के आदेशों के बाद भी अपनी मनमानी जारी रखी, आखिर विभागीय मनमानी अधिकारियों से कब तक वह धनाभाव भुखमरी और मानसिक टेंशन में जंग लड़ती,बीमार पड़ने लगी और समुचित इलाज के अभाव में दिनांक 13 फरवरी 2015 को दम तोड़ दिया उसके बाद अब उनके आश्रित रहने वाले उत्तराधिकारी उनके बड़े भाई व उनका परिवार विभाग से उनके देयकों के भुगतान और अनुकंपा के आधार पर मिलने वाली नौकरी की गुहार लगा रहा है परंतु लगभग 9 10 वर्ष का एक लंबा समय होने जाने के बाद भी विभाग केवल उनसे अपनी परिक्रमा कर रहा है जबकि उमा वर्मा स्वयं ही कागजों पर अपने बड़े भाई को उत्तराधिकारी नामित की थीं। शायद विभाग उत्तराधिकारियों के साथ भी किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है क्योंकि भुखमरी गरीबी का दंश झेलते हुए कोई कब तक जंग कर सकेगा यहां पर यह भी उल्लेखनीय है कुमारी उमा वर्मा के इस प्रकरण में विशेषकर उत्तर प्रदेश के सचिवालय  व कल्याण भवन के अधिकारियों द्वारा माननीय न्यायालय के आदेश व सरकारी आदेशों की जमकर अवहेलना की गई परंतु कुछ अफसर  गलत तैनात होकर भी प्रमोशन पाए रहे और उमा वर्मा को मरते दम तक इन हठी अधिकारियों ने उनका हक तक नहीं दिया तत्कालीन समय में यह मुद्दा अखबारों में उछला परंतु हाईकोर्ट और सरकार को अपनी जेब में रखने वाले इन अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। मरने के बाद भी उत्तराखंड का समाज कल्याण विभाग अपनी हठधर्मिता से बात नहीं आ रहा है और उत्तराधिकारियों के साथ शायद किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है। विभाग की कार्यशैली का आलम यह है कि तमाम जद्दोजहद  के बाद सन् 2021 से प्रारंभ हुई मृतक आश्रित पारिवारिक पेंशन की कार्यवाही तीन,साढे तीन साल गुजर जाने के बाद भी अभी अंजाम तक नहीं पहुंची है।

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