**खुदीराम बोस के बलिदान दिवस पर श्रद्धांजलि, देशभक्ति और त्याग को किया नमन**
लखीमपुर खीरी Aug 11, 2026 at 05:45 PM , 31**लखीमपुर खीरी।** अखिल भारतीय सुभाषवादी जनता एवं श्री वेदमाता गायत्री प्रचार समिति के पदाधिकारियों ने महान युवा देशभक्त एवं क्रांतिकारी खुदीराम बोस के बलिदान दिवस पर उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन किया।
इस अवसर पर वरिष्ठ सुभाषवादी विद्यासागर शर्मा ने कहा कि खुदीराम बोस का बलिदान आज भी देशवासियों को मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने की प्रेरणा देता है। उन्होंने बताया कि खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को मिदनापुर जनपद के बहुवेनी गांव में हुआ था। उनके पिता त्रैलोक्यनाथ बोस और माता लक्ष्मी देवी थीं।
विद्यासागर शर्मा ने कहा कि देश की आजादी के आंदोलन में शामिल होने की उनकी ललक इतनी प्रबल थी कि उन्होंने कक्षा नौ के बाद पढ़ाई छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेना शुरू कर दिया। क्रांतिकारी अनुशीलन समिति की विभिन्न गतिविधियों में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। कई बार जेल की यातनाएं सहने के बावजूद वे अपने लक्ष्य से नहीं डिगे और जीवन की अंतिम सांस तक अपने संकल्प पर अडिग रहे।
श्री वेदमाता गायत्री प्रचार समिति के संस्थापक अध्यक्ष पं. राजेश दीक्षित ने कहा कि **11 अगस्त 1908** का दिन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण बलिदान दिवस के रूप में सदैव याद किया जाएगा। उन्होंने खुदीराम बोस के क्रांतिकारी जीवन और उनके अदम्य साहस को याद करते हुए कहा कि उनका बलिदान देश के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
नरेंद्र अग्रवाल ने कहा कि अंग्रेज अधिकारी जज डगलस किंग्सफोर्ड क्रांतिकारियों पर कठोर कार्रवाई के लिए कुख्यात था। अनुशीलन समिति ने किंग्सफोर्ड को निशाना बनाने का दायित्व क्रांतिकारी प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस को सौंपा था। मुजफ्फरपुर में किंग्सफोर्ड की बग्घी को निशाना बनाकर किए गए हमले में दुर्भाग्यवश किंग्सफोर्ड मौजूद नहीं था और दो यूरोपीय महिलाओं की मृत्यु हो गई। इसके बाद प्रफुल्ल चाकी ने पुलिस से घिर जाने पर स्वयं को गोली मारकर शहादत दी, जबकि खुदीराम बोस बाद में गिरफ्तार कर लिए गए।
मुजफ्फरपुर में उन पर मुकदमा चला और उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। उस समय उनकी उम्र महज 18 वर्ष थी। **11 अगस्त 1908 को खुदीराम बोस हाथ में गीता लेकर और 'वंदे मातरम्' का उद्घोष करते हुए फांसी पर चढ़ गए।** उनके बलिदान से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। युवाओं ने जगह-जगह प्रदर्शन कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
वक्ताओं ने कहा कि खुदीराम बोस युवाओं और महिलाओं के बीच बेहद लोकप्रिय थे। उनके बलिदान ने स्वतंत्रता आंदोलन में नई ऊर्जा का संचार किया। इतिहास में उनका नाम सदैव अमर रहेगा।
चैतन्य भारतीय ने कहा कि खुदीराम बोस के साथ क्रांतिकारी प्रफुल्ल चाकी का नाम भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सदैव अमर रहेगा।































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