शुभ और अशुभ
परिवेश Dec 22, 2021 at 05:55 PM , 927मनुष्य अपने स्वभाव से हारा है। और उसका मज़हब, उसकी विचारधाराएँ, उसकी व्यवस्थाएँ उसके व्यवहार से हारी हैं। व्यवहार, जो उसके स्वभाव और चरित्र का आईना है।
यह निराशावाद नहीं है। अस्तित्ववाद भी नहीं है। प्रगतिवाद भी नहीं है। कोई वाद नहीं है। सार्वभौम सत्य है।
यह भी कि सभी मनुष्य एक-से नहीं होते। न कभी थे, न कभी होंगे। बल्कि कोई भी दो मनुष्य, वे (जुड़वाँ सहित) भाई-भाई या भाई-बहन ही क्यों न हों, पिता-पुत्र, माँ-बेटे ही क्यों न हों, हूबहू एक-से नहीं होंगे।
यह तो स्पष्ट है कि कोई भी दो मनुष्य सूरत-शक्ल से हूबहू एक-से नहीं होते। इसीलिए फ़ोटो पहचान-पत्र की अहमियत है।
किंतु यह भी अनुभव-जन्य सत्य है कि कोई भी दो मनुष्य स्वभाव और चरित्र से भी हूबहू एक-से नहीं होते। वे भले ही एक ही मज़हब, एक ही सम्प्रदाय, एक ही जाति, एक ही नस्ल, एक ही राष्ट्रीयता, एक ही आर्थिक वर्ग, एक ही शिक्षा और एक ही परिवेश में पले-बढ़े क्यों न हों।
तो सभी मनुष्य एक-से न्याय-प्रिय नहीं होंगे, बाहर-भीतर से एक-से अभिन्न नहीं होंगे। एक-से निराडंबर नहीं होंगे। उनकी कथनी-करनी में एक-सा अभेद नहीं होगा। उनमें संवेदनशीलता का, परदु:खकातरता का, दृढ़ता का, आत्म-सम्मान का, लोभ और डर से विचलित न होने के माद्दे का साम्य नहीं होगा।
लेकिन ऐसा नहीं कि न्यायप्रिय, भीतर-बाहर और कथनी-करनी में एकरूप, दृढ़निश्चयी, आत्म-सम्मानी, संवेदनशील, परदु:खकातर, लोभ और डर से न डिगनेवाले होंगे ही नहीं। हर समय होंगे, हर धर्म, हर सम्प्रदाय, हर जाति, हर राष्ट्र, हर खित्ते में होंगे। जैसे अशुभ कभी नहीं मरता, वैसे शुभ भी कभी नहीं मरता। अनुपात बदलता रहता है किंतु बीज कभी नष्ट नहीं होता। अभी भी दोनों जीवित हैं। अभी भी दोनों के बीज मौजूद हैं। इस देश में भी।
इसकी संभावना सतत् बनी हुई है कि न्यायप्रिय, भीतर-बाहर से एकरूप, कथनी-करनी में एक, दृढ़निश्चयी, संवेदनशील, परदु:खकार, लोभ और डर से न डिगनेवालों का पलड़ा भारी हो जाए। काल और स्थान के टुकड़ों में ही सही, ऐसा पहले भी हुआ है। कई बार हुआ है। इतिहास गवाह है। तो आगे क्यों नहीं होगा ?
शुभ के ऊपर आने में संख्या-बल से ज़्यादा आत्म-आश्वस्ति का बल काम करता है। शुभ और अशुभ के मुक़ाबले में अशुभ के पशु-बल से अधिक शुभ का आत्म-आश्वस्ति का बल काम करता है। यह आश्वस्ति शुभ में ही हो सकती है। अशुभ कितना भी बलवान हो वह आत्म-अश्वस्ति से महरूम होता है। यह प्रकृति का खेल है और सनातन है। मनोवैज्ञानिक इसकी व्याख्या खोजते फिरें, किंतु इसे काट नहीं पाएँगे।
एक शुभ के हिम्मत करते ही, अनेक शुभ उससे जुड़ने लगते हैं। शुभ को शुभ खींचता है। दबे हुए शुभ को बाहर लाता है। फ़िल्म, नाटक वगैरह में नायक के जीतने और खलनायक के हारने पर यथार्थ जीवन के नायक और खलनायक दोनों ख़ुश होकर ताली बजाते हैं।
इसलिए यह तात्विक रूप से निराशावाद नहीं है। अस्तित्ववाद भी नहीं है। कोई वाद नहीं है।
इतना अवश्य कहा जा सकता है कि भविष्य में जितनी संभावना सम्पूर्ण विश्व में सर्वहारा क्रांति होने की है (संपूर्ण विश्व में हुए बिना पूँजीवादी घेराबंदी उसे वर्गविहीन समाज के लक्ष्य तक पहुँचने ही नहीं देगी), शुभ का पलड़ा भारी होने की संभावना उससे अधिक नहीं, तो कम भी नहीं है।
हाँ, जिनको समस्त मानव-समुदाय के (हमेशा के लिए) दिव्यांतर का भरोसा है, उनके लिए यह लेख अर्थहीन है।
प्रफुल्ल सिंह "बेचैन कलम"
युवा लेखक/स्तंभकार/साहित्यकार
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
सचलभाष/व्हाट्सअप : 6392189466
ईमेल : prafulsingh90@gmail.com






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