गौरी-शंकर का दाम्पत्य : प्रेम, समर्पण और साथ निभाने की अनूठी सीख

परिवेश , 77

सावन का पावन महीना है। चारों ओर शिवभक्ति की गूंज है। मंदिरों में हर-हर महादेव का जयघोष है और सुहागिनों के मन में एक ही प्रार्थना—**गौरी-शंकर जैसा प्रेम, विश्वास और सुखमय दाम्पत्य जीवन।**

 *राकेश पाण्डेय "निश्छल"*
भारतीय लोकजीवन में भगवान शिव और माता पार्वती केवल आराध्य देव नहीं हैं, वे दाम्पत्य जीवन के उस आदर्श स्वरूप के प्रतीक हैं, जिसमें प्रेम के साथ धैर्य है, अधिकार के साथ सम्मान है और मतभेदों के बीच भी एक-दूसरे का हाथ थामे रखने का संकल्प है।
 
माता पार्वती कभी रूठती हैं, तो भोलेनाथ उन्हें मनाते हैं। महादेव के पास संसार का वैभव नहीं, लेकिन पत्नी की इच्छा उनके लिए कभी छोटी नहीं होती। वे अपनी अर्धांगिनी को सम्मान देते हैं, उनकी भावनाओं को महत्व देते हैं। शायद इसी कारण भारतीय लोक में शिव को **‘सर्वश्रेष्ठ पति’** के रूप में देखा गया—ऐसा पति जिसके मन में छल न हो, प्रेम में दिखावा न हो और पत्नी के सम्मान में कोई कमी न हो।
 
सावन के सोमवार को कन्याएं शिव की आराधना करते हुए जिस वर की कामना करती हैं, उसमें बहुत कुछ इसी लोकभावना की झलक मिलती है—**भोला-भाला जीवनसाथी, जिसके हृदय में कपट न हो; धन कम हो तो चले, लेकिन प्रेम कम न हो; पत्नी रूठे तो उसे मनाने का धैर्य हो और उसके सम्मान को अपने सम्मान से कम न समझे।**
 
लेकिन शिव-पार्वती का संबंध केवल पति के आदर्श की कहानी नहीं है। यह पत्नी के धैर्य, समझ और समर्पण की भी उतनी ही बड़ी कथा है।
 
महादेव अपने आप में मग्न रहने वाले योगी हैं। तपस्या में लीन हों तो संसार की सुध-बुध तक भूल जाते हैं। उनके लिए वैभव का कोई अर्थ नहीं। वे औघड़ हैं, सरल हैं और जो मांग लिया, सहज भाव से दे देते हैं। कभी-कभी उनके वरदानों से संकट भी खड़े हो जाते हैं। तब माता पार्वती शक्ति का स्वरूप धारण कर उस संकट का समाधान करती हैं।
 
उन्होंने शिव को बदलने की कोशिश नहीं की, बल्कि **उनके साथ चलना सीखा।** शिव की सरलता को समझा, उनकी तपस्या का सम्मान किया और उनकी शक्ति बनकर उनके अधूरेपन को पूर्णता दी।
 
यही तो दाम्पत्य की असली खूबसूरती है—**दो पूर्ण व्यक्तियों का मिलना नहीं, बल्कि दो अलग स्वभावों का एक-दूसरे को स्वीकार करके पूर्ण बन जाना।**
 
शिव और शक्ति का संबंध हमें यह भी सिखाता है कि विवाह केवल साथ रहने का नाम नहीं है। विवाह का अर्थ है—एक-दूसरे की कमियों को समझना, गुणों को स्वीकारना, कठिन समय में हाथ न छोड़ना और मतभेद होने पर भी मन में दूरी न आने देना।
 
कहा जाता है कि **पति की सामाजिक प्रतिष्ठा के पीछे पत्नी की भूमिका बहुत बड़ी होती है।** शिव की शक्ति भी पार्वती ही हैं। शिव बिना शक्ति के ‘शव’ हैं—यह प्रतीक अपने भीतर बहुत गहरी बात समेटे हुए है। जीवन में भी जब प्रेम, सहयोग और विश्वास साथ हो, तो साधारण मनुष्य असाधारण ऊंचाइयां छू सकता है।
 
दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने के लिए हमेशा धन-दौलत, बड़ा घर और ऐश्वर्य जरूरी नहीं होता। कभी-कभी एक **सच्ची मुस्कान, एक मधुर शब्द, एक छोटा-सा स्पर्श और ‘मैं तुम्हारे साथ हूं’ का भरोसा** ही रिश्ते को बचाने के लिए पर्याप्त होता है।
 
पति-पत्नी के बीच विवाद होना असामान्य नहीं है। दो अलग व्यक्तित्व जब एक साथ जीवन बिताते हैं, तो मतभेद होना स्वाभाविक है। लेकिन हर मतभेद को मनभेद बनने से रोकना ही रिश्ते की परिपक्वता है। कई बार जिस बात को हम घंटों बहस करके सुलझाना चाहते हैं, उसे एक सहज मुस्कान और प्रेम से कही गई दो पंक्तियां समाप्त कर देती हैं।
 
भारतीय लोक ने शायद इसीलिए शिव-पार्वती को दाम्पत्य का आदर्श माना। विवाह के मंगल अवसरों पर आज भी गौरी-शंकर के गीत गाए जाते हैं। सावन में सुहागिनें और कन्याएं शिव-पार्वती का स्मरण करती हैं, क्योंकि उनके लिए गौरी-शंकर केवल देवता नहीं, **एक ऐसे रिश्ते का प्रतीक हैं जिसमें प्रेम है, विश्वास है, सम्मान है और जीवनभर साथ निभाने का संकल्प है।**
 
सावन में मंदिर में हाथ जोड़ते समय केवल यह मत मांगिए कि जीवनसाथी आपकी हर इच्छा पूरी करे। यह भी प्रार्थना कीजिए कि **आप दोनों में एक-दूसरे की इच्छा समझने का विवेक हो, रूठने पर मनाने का प्रेम हो, गलती पर क्षमा करने का साहस हो और कठिन समय में हाथ थामे रहने का धैर्य हो।**
 
क्योंकि जीवन में धन आएगा-जाएगा, वैभव घटेगा-बढ़ेगा, प्रतिष्ठा मिलेगी और कभी छिनेगी भी—लेकिन यदि जीवन की यात्रा में कोई ऐसा साथी मिल जाए जो **निश्छल प्रेम करे, सम्मान दे और धर्म के पथ पर हाथ थामकर साथ चले**, तो उससे बड़ा सौभाग्य शायद ही कोई हो।
 
**इस सावन हाथ जोड़िए गौरी-शंकर के सामने... धन-वैभव से पहले ऐसा प्रेम मांगिए जो समय के साथ और गहरा हो, ऐसा साथ मांगिए जो विपत्ति में भी न छूटे, ऐसा जीवनसाथी मांगिए जिसके मन में छल न हो, और स्वयं भी ऐसा साथी बनने का संकल्प लीजिए।**
 
क्योंकि **गौरी-शंकर का दाम्पत्य हमें यही सिखाता है—जहां धर्म के साथ प्रेम हो, प्रेम के साथ सम्मान हो और सम्मान के साथ समर्पण हो, वहां साधारण-सा जीवन भी स्वर्ग बन जाता है।**
 
**हर-हर महादेव।** **जय गौरी-शंकर।**

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