बदलते दौर में बदलती राजनीति : क्या भाजपा भी वही गलती कर रही है, जिससे कभी कांग्रेस जूझी थी?

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 1984 के बाद पहली बार वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। उस समय कांग्रेस अपने सबसे कमजोर राजनीतिक दौर में पहुंच गई थी। लेकिन राजनीति स्थिर नहीं रहती। समय बदलता है, पीढ़ियां बदलती हैं, मतदाता बदलते हैं और उनके सवाल भी बदल जाते हैं।
 
करीब एक दशक पहले कांग्रेस की गिरती लोकप्रियता को लेकर राजनीतिक विश्लेषक रामचंद्र गुहा ने पीढ़ी परिवर्तन और नेतृत्व की स्वीकार्यता से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठाए थे। आज उन्हीं सवालों को बदलते संदर्भ में भाजपा और नरेंद्र मोदी के दौर को समझने के लिए भी देखा जा सकता है।
 
### पहली चुनौती : पीढ़ी बदल रही है
 
2014 में जो बच्चा करीब 10 वर्ष का था, वह आज 22 वर्ष का युवा है। जिसने 2014 में राजनीतिक चेतना की शुरुआत की, उसने अपने आसपास मुख्यतः मोदी सरकार को ही देखा है। वहीं जो उस समय चार-पांच वर्ष का था, वह आज 16-17 वर्ष का है और अगले कुछ वर्षों में पहली बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने जा रहा है।
 
इस नई पीढ़ी के राजनीतिक अनुभव में मनमोहन सिंह सरकार या उससे पहले की कांग्रेस सरकारें प्रत्यक्ष अनुभव का हिस्सा नहीं हैं। उसने जिस भारत को राजनीतिक रूप से समझना शुरू किया, उसमें नरेंद्र मोदी एक प्रमुख चेहरा रहे हैं।
 
लेकिन यहीं भाजपा के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है—**क्या केवल पुराने राजनीतिक संघर्षों और कांग्रेस के अतीत के सहारे नई पीढ़ी को लंबे समय तक जोड़ा जा सकता है?**
 
नई पीढ़ी अतीत की तुलना में भविष्य के सवाल अधिक पूछती है। उसे रोजगार चाहिए, बेहतर शिक्षा चाहिए, तकनीकी अवसर चाहिए, उद्यमिता चाहिए, सुरक्षित और आधुनिक शहर चाहिए तथा दुनिया में भारत की मजबूत भूमिका चाहिए।
 
### दूसरी चुनौती : विपक्ष का ‘डिलीवरी मॉडल’
 
2014 में नरेंद्र मोदी के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत यह थी कि वे गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अपने काम और विकास मॉडल को जनता के सामने रख रहे थे। इसके विपरीत राहुल गांधी को एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता था, जिनके पास नेहरू-गांधी परिवार की विरासत तो थी, लेकिन व्यापक स्तर पर उनके अपने प्रशासनिक काम का अनुभव जनता के सामने नहीं था।
 
समय के साथ तस्वीर बदली है।
 
आज राहुल गांधी विपक्ष के नेता के रूप में सरकार से लगातार सवाल करते दिखाई देते हैं। बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक न्याय, संस्थाओं की भूमिका, चुनावी प्रक्रिया और अन्य मुद्दों पर वे सरकार को घेरते हैं। जनता का एक वर्ग उनके इस नए राजनीतिक रूप को पहले की तुलना में अधिक गंभीरता से देख रहा है।
 
यानी जिस **‘डिलीवरी’** की कमी कभी राहुल गांधी की सबसे बड़ी राजनीतिक कमजोरी मानी जाती थी, आज विपक्ष में रहते हुए वे अपने तरीके से उसे पूरा करने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं।
 
यह जरूरी नहीं कि हर मतदाता उनके तर्कों से सहमत हो। लेकिन राजनीति में धारणा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितना प्रदर्शन। यदि किसी नेता को लगातार संघर्ष करते हुए, सवाल उठाते हुए और जनता के मुद्दों पर सरकार से भिड़ते हुए देखा जाता है, तो उसकी राजनीतिक स्वीकार्यता बदल सकती है।
 
### नई पीढ़ी को नारों से नहीं, सवालों के जवाब से जोड़ा जा सकता है
 
आज की **Gen Z** सोशल मीडिया, इंटरनेट और वैश्विक सूचनाओं के दौर में बड़ी हुई है। वह राजनीतिक भाषण सुनने के साथ-साथ आंकड़े खोजती है, अलग-अलग विचार पढ़ती है और सत्ता तथा विपक्ष दोनों से सवाल पूछती है।
 
ऐसे युवा को केवल किसी राजनीतिक विरोधी के लिए नए-नए विशेषण गढ़कर अपने पक्ष में करना आसान नहीं होगा।
 
राजनीति में शब्दों की अपनी भूमिका है, लेकिन शब्द तभी प्रभावी होते हैं जब उनके पीछे ठोस काम और विश्वसनीय तर्क हों।
 
युवा यह जानना चाहता है कि अगले पांच या दस वर्षों में उसके लिए क्या अवसर होंगे। वह पूछता है—**नौकरी कहां है? शिक्षा कितनी बेहतर हुई? छोटे शहरों में अवसर कब आएंगे? तकनीक और एआई के दौर में मेरा भविष्य क्या होगा? देश की अर्थव्यवस्था मुझे क्या देगी?**
 
इन सवालों के जवाब जितने मजबूत होंगे, राजनीतिक समर्थन भी उतना ही मजबूत होगा।
 
### भाजपा के लिए चेतावनी नहीं, आत्ममंथन का अवसर
 
नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और भाजपा का संगठन आज भी भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी शक्तियों में हैं। लेकिन कोई भी राजनीतिक दल हमेशा एक ही मुद्दे, एक ही नेतृत्व और एक ही पीढ़ी के राजनीतिक अनुभव के सहारे नहीं चल सकता।
 
2014 की भाजपा और 2026 की भाजपा के बीच एक पूरी पीढ़ी का अंतर पैदा हो चुका है।
 
जिस युवा ने मोदी युग में आंखें खोली हैं, उसके सामने मोदी सरकार की उपलब्धियां अब ‘नई’ नहीं हैं। उसके लिए वे सामान्य राजनीतिक पृष्ठभूमि का हिस्सा हैं। इसलिए भविष्य की राजनीति में उपलब्धियों को केवल गिनाना पर्याप्त नहीं होगा; **उन उपलब्धियों को अगली पीढ़ी की आकांक्षाओं से जोड़ना होगा।**
 
यही राजनीति का सबसे बड़ा सत्य है—**मतदाता किसी दल का स्थायी ऋणी नहीं होता।**
 
कांग्रेस ने कभी सोचा था कि उसका ऐतिहासिक योगदान और नेहरू-गांधी परिवार की विरासत उसे लंबे समय तक राजनीतिक केंद्र में बनाए रखेगी। फिर समय बदला और मतदाता ने विकल्प तलाश लिया।
 
आज भाजपा के सामने भी चुनौती यही है कि वह अपने वर्तमान को अपनी विरासत न समझे।
 
क्योंकि राजनीति में सत्ता मिलने के बाद सबसे कठिन काम सत्ता बनाए रखना नहीं, बल्कि **हर नई पीढ़ी को यह विश्वास दिलाते रहना है कि उसका भविष्य आपके साथ बेहतर होगा।**
 
और लोकतंत्र में यही सबसे बड़ा ‘डिलीवरी टेस्ट’ है।

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