दहेज प्रथा भारतीय समाज पर एक भयावह कलंक

लखीमपुर खीरी , 137

नरेंद्र मिश्रा

मैगलगंज खीरी।मानव समाज और सभ्यता के समक्ष अनेक चुनौतियाँ विद्यमान हैं, किंतु उनमें से एक सामाजिक विकृति ऐसी है, जिसका कोई ठोस समाधान आज तक सामने नहीं आ सका है। विवाह संस्कार से जुड़ी दहेज प्रथा भारतीय समाज के लिए एक भयंकर अभिशाप बन चुकी है, जो हमारी सभ्यता और संस्कृति पर लगा गहरा कलंक है।दहेज प्रथा महिलाओं के साथ होने वाले मानसिक एवं शारीरिक उत्पीड़न को बढ़ावा देती है। यह कुरीति आज समाज के हर वर्ग को अपनी गिरफ्त में ले चुकी है। संपन्न वर्ग इसे अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा और शानो-शौकत के प्रदर्शन का माध्यम मानता है, जबकि निर्धन अभिभावकों के लिए बेटी के विवाह में दहेज देना मजबूरी बन गया है। उन्हें भय रहता है कि बिना दहेज के बेटी को विदा करने पर उसका ससुराल में जीवन कठिन हो सकता है।आज कई परिवार बेटी के विवाह में किए गए खर्च को एक निवेश के रूप में देखते हैं। उन्हें लगता है कि अधिक दहेज देने से न केवल उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ेगी, बल्कि बेटी को ससुराल में सम्मान और सुरक्षा भी मिलेगी। दुर्भाग्यवश हमारा सामाजिक वातावरण ऐसा बन चुका है, जहाँ व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसके संस्कारों से नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक स्थिति से आँकी जाती है।इसी मानसिकता के कारण दहेज की लालसा सामान्य हो गई है। आए दिन दहेज हत्या, घरेलू हिंसा और आत्महत्या से जुड़े समाचार समाज की इसी भयावह सच्चाई को उजागर करते हैं। विडंबना यह है कि जिसे जितना अधिक दहेज मिलता है, उसे समाज में उतनी ही सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।दहेज का यह दावानल पूरी युवा पीढ़ी को भी अपनी चपेट में ले रहा है। बेरोजगार युवक की भी कीमत लाखों में आँकी जाती है, जबकि नौकरीपेशा युवकों के लिए मानो खुलेआम बोली लगती है। इस सौदेबाजी में न तो संस्कार देखे जाते हैं और न ही चरित्र।दहेज के दुष्परिणाम विवाह के बाद भी सामने आते हैं। कई बार बहू के साथ दहेज का अभिमान भी घर में प्रवेश करता है, जिससे पारिवारिक सुख-शांति भंग हो जाती है। यही स्थिति आगे चलकर मानसिक तनाव, पारिवारिक कलह और आत्महत्याओं का कारण बनती है।दहेज के औचित्य पर आज गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। दूसरे के धन से की गई शानो-शौकत क्या वास्तविक सम्मान दिला सकती है। यह दिखावा यदि करना ही है तो अपने परिश्रम की कमाई से क्यों नहीं? दहेज लेने वाला ही नहीं, बल्कि देने वाला भी इस सामाजिक अपराध में बराबर का दोषी है।हालाँकि दहेज निषेध कानून मौजूद है, लेकिन केवल कानून के सहारे इस कुप्रथा को समाप्त नहीं किया जा सकता। समाज की सामूहिक चेतना और कठोर सामाजिक निर्णय इसमें अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। कुछ समाजों और पंचायतों द्वारा दहेज लेने या देने वालों के सामाजिक बहिष्कार जैसे निर्णय इस दिशा में सकारात्मक संकेत हैं। यदि समाज दृढ़ संकल्प ले, तो दहेज प्रथा का अंत अवश्य संभव है।

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