तक्षशिला में याद किया गया गुरुओं और साहिबज़ादों का बलिदान

लखीमपुर खीरी , 66

लखीमपुर खीरी।क्रूर मुगल सल्तनत के अत्याचारों के विरुद्ध सनातन धर्म की दो अटूट शाखाओं हिंदू और सिख समाज के योद्धाओं द्वारा किया गया ऐतिहासिक साझा संघर्ष भारतीय इतिहास में विशिष्ट स्थान रखता है। महान हिन्दू क्षत्रिय बाबा हरिदास और माता अनूप कौर के पुत्र एवं सिखों के चौथे गुरु रामदास से लेकर उनके वंशज गुरु अर्जन देव, गुरु हर गोविंद सिंह, गुरु हर राय, गुरु हर कृष्ण, गुरु तेग बहादुर और गुरु गोविंद सिंह क्रमशः सिखों के पांचवें, छठे, सातवें, आठवें, नौवें और दसवें गुरु बने। इन सभी गुरुओं ने सनातन धर्म और उसकी आनुषंगिक शाखाओं अर्थात हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध एवं अन्य भारतीय समुदायों की रक्षार्थ अपना एवं अपने परिवार का सर्वोच्च बलिदान दिया।इन बलिदानों के क्रम में उनके साथ बाबा बंदा बहादुर, बाबा टोडरमल जैसे अनेक हिन्दू योद्धाओं के बलिदान भी अंकित हुए। दशमेश गुरु श्री गोविंद सिंह जी के चार साहिबज़ादों बाबा अजीत सिंह, बाबा जुझार सिंह, बाबा ज़ोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह और माता गूजरी जी का बलिदान इस बात का गवाह है कि सनातन संघर्ष की इस महान गाथा में हिंदू-सिख समुदाय के छोटे बच्चों और महिलाओं ने भी अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।सिखों के दसवें गुरु एवं जन्म से क्षत्रिय योद्धा श्री गोविंद राय अपने पिता गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान के बाद आनंदपुर साहिब में सन 1699 की बैसाखी पर पंच प्यारों से अमृत छककर गोविंद सिंह बने और उनके द्वारा बनाए गए खालसा पंथ ने इस्लामी सल्तनत के विरुद्ध विद्रोह का नया दौर शुरू किया। आनंदपुर का किला इस एकता का केंद्र बना, जहां गुरु जी ने राजा दया सिंह जैसे अनेक हिंदू राजाओं को सिख खालसा पंथ के साथ जोड़ा। मुगल सेनापति वजीर खान की सेना के सामने 'वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह' का उद्घोष गूंजा। भंगानी युद्ध में हिंदू राजपूतों और सिख सिपाहियों ने संयुक्त पराक्रम से दुश्मन को धूल चटाई। वेदों की ऋचाएं और गुरुओं की गुरबानी एक स्वर में गूंजी।चार साहिबजादों का अलौकिक बलिदान इस महायुद्ध का चरम था। बड़े साहिबजादे अजीत सिंह और जुझार सिंह चमकौर के युद्ध में हिंदू-सिख योद्धाओं संग वीरगति को प्राप्त हुए। छोटे जोरावर सिंह और फतेह सिंह को सरहिंद में नवाब वजीर खान ने ठंडे बुर्ज में बंद कर दीवार में चिनवा दिया। माता गुजरी जी ने भी अपना बलिदान देकर गुरुओं की परंपरा का अनुसरण किया। हिंदू राजा टोडरमल ने उनका एवं गुरु गोबिंद सिंह के चार साहिबज़ादों के अंतिम संस्कार के लिए इस्लामी सल्तनत से भूमि को स्वर्ण मुद्राएं से घेरकर, ऐतिहासिक बना दिया।चमकौर, मुक्तसर जैसे युद्धों में महाराणा रणजीत सिंह जैसे जाट-सिख योद्धाओं ने खालसा संग कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध किया। गुरु गोविंद सिंह जी ने राम-कृष्ण की भक्ति के उद्धरणों को गुरबानी में समाहित किया। भगवा ध्वज और खंडा, क्रूर इस्लामिक सल्तनत का अंत करने के लिए साझा रूप से लहराने लगे।शताब्दियों बाद यह बलिदान प्रासंगिक बना हुआ। हिंदू धर्म और खालसा पंथ एक दूसरे के पूरक कवच बनकर उभरे और उनकी एकता की अटूट शक्ति ने आनंदपुर-सरहिंद से भारत की रक्षार्थ धर्मयुद्ध का साझा बिगुल फूंक दिया। इस एकता का यह परिणाम रहा कि एक समय तक अजेय मानी जाने वाली मुगल सल्तनत धीरे-धीरे टूट कर बिखरना शुरू हो गई।गत 28 दिसंबर, 2025 को तक्षशिला विश्वविद्यापीठ, लखीमपुर खीरी में हिंदू-सिख समाज के इन्हीं महान योद्धाओं की पुण्य स्मृति में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में स्थानीय गुरुद्वारे से पधारे शिष्ट-मंडल ने गुरुकुल में गुरबानी का पाठ किया। उसके पश्चात गुरुकुल के छात्रों एवं स्थानीय क्षेत्रवासियों को सनातन की रक्षार्थ दिए गए बलिदानों के विषय में जानकारी प्रदान की। कार्यक्रम के पश्चात चार साहिबज़ादे फ़िल्म का प्रदर्शन कर सभी श्रद्धालुओं को रील में रियल इतिहास का बोध कराया गया।तक्षशिला विश्वविद्यापीठ के द्वारा आयोजित किए गए इस कार्यक्रम का संयोजन कुलदीप रूपम, सरदार बाबा सिंह, बख्शीश सिंह, जगतार सिंह, एवं सतनाम सिंह ने किया। इंजी० रवि सिंह ने गुरुकुल की ओर से गुरु साहिब को विशेष अरदास प्रेषित कर पधारे हुए कथावाचकों का सम्मान किया। एड० राहुल तिवारी, मनोज श्रीवास्तव, रिंकू सिंह, अंकित मेहरोत्रा, कुश मिश्रा, अमन श्रीवास्तव, निखिल जावरानी, आशुतोष कुमार, दीपक अग्रवाल, सांची माथुर, आरती यज्ञसेनी, नवीन चंद्र वैश्य, एवं भानु कुमार ने लंगर सेवा में अपना सहयोग समर्पित कर कार्यक्रम को पूर्णता प्रदान की।एड० अखिलेश सिंह, मोहन धवन, प्रतीक बरनवाल, चेतन आंनद, राकेश सिंह एवं कैलाश नाथ गुप्ता के द्वारा भौतिक रूप से उपस्थित न हो पाने के कारण अपने प्रतिनिधियों के द्वारा गुरु के लंगर में अपनी सेवा समर्पित की गयी। बरेली से सतीश नारायण खन्ना, फरीदाबाद से अजीत कुमार मिश्रा, लुधियाना से अरविंद कुमार कौंडल एवं दिल्ली से धीरज चौधरी ने भी गुरुओं के सम्मान में अपना दूरस्थ अंशदान समर्पित किया। गुरुकुल-निर्माणी टीम से विकास सिंह,कन्हैयालाल मिस्त्री, मुन्नालाल मिस्त्री एवं राजू, जीतू व सुनील श्रमिक बंधुओं ने भी गुरु के लंगर में तन-मन-धन से अपना गिलहरी सहयोग प्रदान किया। कार्यक्रम के अंत में आचार्य श्रीवृत्त ने सभी आगंतुकों एवं सेवादारों को कार्यक्रम की सफलता हेतु धन्यवाद प्रेषित कर कार्यक्रम के समापन की घोषणा की।

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