“ मूर्ति व सद्ग्रन्थ भगवान नहीं, भगवदवतार के प्रतीक मात्र - महात्मा रोहित दास”

लखीमपुर खीरी , 787

मझवारा लखीमपुर।                                                                       स्वामी सदानन्द जी परमहंस द्वारा संस्थापित संस्था सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के तत्त्वावधान में विजयादशमी  के अवसर पर परमभाव धाम आश्रम, मझवारा में सत्संग कार्यक्रम के अंतिम दिन में  बोलते हुए महात्मा रोहित दास ने कहा , जो लोग मूर्तियों अथवा सद्ग्रन्थों को ही परमात्मा-परमेश्वर या खुदा-गॉड-भगवान ही मानकर या उनके समान ही समझकर उन्हीं मूर्तियों या सद्ग्रन्थों की पूजा-पाठ, मनन-चिन्तन तथा पूर्ण समर्पण भाव से भक्ति-सेवा करते है और उन्हीं का दर्शन कर अपने को धन्य-धन्य या कृत-कृत्य हुआ समझते हैं, वे सब के सब भयंकर भूल और भ्रम के शिकार हैं। कोई भी मूर्ति परमात्मा-परमेश्वर या भगवान नहीं, बल्कि भगवदावतार का एक प्रतीक मात्र है। अतः मूर्तियों को मान्यता देना, आदर-सम्मान देना, पूजा-उपासना का प्रतीक मानना तो ठीक है, मगर वह ही भगवान है—ऐसा मानकर उसमें ही चिपके रहना अपने जीवन के लक्ष्य से बिचलित होना है । उनमें चिपके रहने या फँसे रहने के बजाय परमात्मा-परमेश्वर या खुदा-गॉड-भगवान को प्राप्त करने हेतु उन मूर्तियों को प्रेरणादायक माध्यम समझते हुये उस परमात्मा को प्राप्त कराने वाले वर्तमान तत्त्वज्ञानदाता सत्पुरुष के तरफ हर किसी को अग्रसर होना चाहिये । जैसे गरूड़, नारद भगवान श्री विष्णु जी की तरफ, लक्ष्मण, हनुमान, कागभुसुंडि, सेवरी भगवान श्री राम जी की तरफ, ऊद्धव, अर्जुन, गोपी, मैत्रेय भगवान श्री कृष्ण जी की तरफ अग्रसर होकर समर्पित शरणागत हो गये थे । वैसे ही हमें भी वर्तमान तत्त्वज्ञान दाता सदगुरु की खोज करनी चाहिए ।
महात्मा जी ने कहा आज आश्रम परिसर के नव निर्मित मंदिर में भगवान श्री विष्णु जी , श्री राम जी,  श्री कृष्ण जी एवं श्री सदानन्द जी की मूर्ति स्थापित किया जाएगा।

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