मनुष्य जीवन भोग के लिए नहीं,मोक्ष के लिए - महात्मा दीपक दास

लखीमपुर खीरी , 280

 मझवारा लखीमपुर।  सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के तत्त्वावधान में विजया दशमी  के अवसर पर परमभाव धाम आश्रम, मझवारा में सत्संग कार्यक्रम में बोलते हुए महात्मा दीपक दास ने कहा जब तक हम अपने को अर्थात शरीर में रहकर हम-हम-हम करने वाला जीव को जाने-देखेंगें नहीं कि हमारा अस्तित्व क्या है ? तब तक हमारा कर्तव्य कैसे मालूम होगा कि हमें क्या करना है ? जब कर्तव्य ही नहीं मालूम कि क्या करना है तब जिम्मेदारी कैसी ? सर्वप्रथम हम को जानना -देखना है कि ‘हम’ क्या है ? जब हम को जानकारी होगी कि हम फला है तब ही कर्तव्य का निधारण होगा । हम शरीर नहीं है इसलिए सर्व प्रथम हमे यह जानना जरूरी है कि यह मनुष्य जीवन क्या है और यह मनुष्य जीवन किसलिए मिला है । अगर यह नहीं जाना तो हमारा यह मानव शरीर केवल विष्ठा की मशीन ही हो कर रह जाएगी ।
       महात्मा जी ने आगे कहा कि मनुष्य जीवन का उद्देश्य ही यही है कि सबसे पहले अपने आप को जानें कि ‘हम’ कौन है ? कहाँ से ये आया है और क्या करने आया है ? वास्तव में ‘हम’ शरीर नहीं है ‘हम’ अपने को  नाशवान शरीर समझना ही दुनिया का सबसे बड़ा और पहला झूठ है । यहीं से संसार में झूठ का बीजारोपण शुरु होता है जिससे जीव (रूह-सेल्फ) अज्ञानतावश हमार परिवार (माता-पिता, पति-पत्नि, पुत्र-पुत्री आदि) भ्रमजाल रूप मायाजाल में फँसते हुए पतन और विनाश को जाता हुआ ‘मोक्षपर्यन्त’ चौरासी लाख योनियों के चक्कर में घूमता हुआ दुःसह दुःख रूप ‘जनम और मृत्यु’ की यातनाओं से गुजरता रहता है। जैसे ही हम अपने को नाशवान शरीर में रहने वाला चेतन और अविनाशी जीव के रूप में जाने देखेंगे तब हमारा जीवन सत्य में अर्थात धर्म में प्रवेश करेगा।

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