पंडित दीन दयाल जी की जयंती मनाई गई शिशु वाटिका

लखीमपुर खीरी , 132

लखीमपुर खीरी।विद्या भारती विद्यालय सनातन धर्म सरस्वती शिशु वाटिका लखीमपुर खीरी में आज दिनांक-25/09/25 को वंदनासभा में मां सरस्वती एवं  पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के समक्ष विद्यालय की संचालिका श्रीमती हीरा सिंह एवं  शिक्षिका श्रीमती रजनी कपूर जी ने दीप प्रज्जवलन व पुष्पार्चन कर बहन तनिष्का शुक्ला प्रभात (ख) को रोली तिलक लगाकर जन्मदिन मनाया गया। फिर पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयन्ती का कार्यक्रम मनाया गया। विद्यालय की संचालिका श्रीमती हीरा सिंह जी ने बताया पंडित दीन दयाल उपाध्याय जनसंघ के राष्ट्रजीवन दर्शन के निर्माता माने जाते हैं। उनका उद्देश्य स्वतंत्रता की पुनर्रचना के प्रयासों के लिए विशुद्ध भारतीय तत्व दृष्टि प्रदान करना था। उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रुप में  प्रस्तुत करते हुए एकात्म मानववाद की विचारधारा दी। उन्हें जनसंघ की आर्थिक नीति का रचनाकार भी माना जाता है। उनका विचार था । कि आर्थिक विकास का मुख्य उद्देश्य सामान्य मानव का सुख है। उन्होंने ये भी बोला "भारत में रहने वाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाला मानव समूह एक जन है। उनकी जीवन प्रणाली, कला ,साहित्य ,दर्शन सब भारतीय संस्कृति है । इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है। इस संस्कृति में निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा। कार्यक्रम की संयोजिका बहन रजनी कपूर ने उनके जीवन परिचय पर प्रकाश डालते हुए बताया पंडित दीन दयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर सन् 1916 को धनकिया नामक स्थान पर जयपुर अजमेर रेलवे लाइन के पास राजस्थान में हुआ था। उनके पिता का नाम भगवती प्रसाद उपाध्याय था। नागला चंद्रभान दीनदयाल जी का पैतृक गाँव था। पिता रेलवे में जलेसर रोड स्टेशन के सहायक स्टेशन मास्टर थे।  पिता भगवती प्रसाद ने अपने बच्चों को ननिहाल भेज दिया। उस समय उपाध्याय जी के नाना चुन्नीलाल शुक्ल धानक्या जयपुर राजस्थान में स्टेशन मास्टर थे। नाना का परिवार बहुत बड़ा था। दीनदयाल जी अभी 3 वर्ष के नहीं हुए थे कि उनके पिता का देहान्त हो गया। पिता की मृत्यु के बाद रामप्यारी को अपना जीवन अंधकारमय लगने लगा। वे अत्यधिक बीमार रहने लगीं और उन्हें क्षयरोग लग गया। 8 अगस्त, 1924 को उनका भी देहावसान हो गया। उस समय दीनदयाल 7 वर्ष के थे। फिर वो अपने नाना नानी के पास रहने लगे। अपनी पूरी शिक्षा नाना नानी के साथ रहकर पूरी पढ़ने में वो बहुत टॉपर थे। 1937 में जब कानपुर से बी.ए. कर रहे थे । अपने सहपाठी  बालूजी महाशब्दे की  प्रेरणा से राष्ट्रीय स्वयं संघ के संपर्क में आए।  संघ के संस्थापक डॉ हेडगेवार का सानिध्य कानपुर में ही मिला। उपाध्याय जी ने पढ़ाई पूरी होने के बाद संघ में दो वर्षों तक प्रशिक्षण पूर्ण किया और संघ के जीवनवृत्ति प्रचारक हो गए। आजीवन संघ के प्रचारक रहे। कार्यक्रम का समापन वंदेमातरम् के साथ हुआ।।

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