“गुरु करो दस पाँचा, जब तक मिले नहीं साँचा” -- महात्मा दशरथ दास जी

लखीमपुर खीरी , 836

हथिगवां लखीमपुर। स्वामी सदानन्द जी परमहंस द्वारा संस्थापित संस्था सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के तत्त्वावधान में हाथिगवां में चल रहे सत्संग कार्यक्रम के पांचवां दिन बोलते हुए महात्मा दशरथ दास ने कहा  साँचे गुरु के तलाश में किसी भी व्यक्ति को चाहे जितने भी गुरु बदलने पड़े तो भी बिना किसी संकोच के बदलते रहना चाहिए । सांचे गुरु के ज्ञान में चार अक्षर वाला विराटपुरुष भगवान सामने ही साक्षात् दिखाई देता है और उस भगवान से मुक्ति-अमरता का साक्षात् बोध तत्क्षण प्राप्त होता है । किसी भी मानव के लिये जीते जी अमरत्त्व को प्राप्त कर लेना ही अपने जीवन को सफल-सार्थक बना लेना है । यदि गुरु के ज्ञान से ऐसी उपलब्धि नहीं मिली है तो जिज्ञासु को यह समझ लेना चाहिये कि वह गुरु साँचा गुरु नहीं है। 
                महात्मा जी ने आगे कहा हमे सन्त ज्ञानेश्वर जी के रुप में साँचा गुरु ही मिला है जिन्होने भगवान श्रीविष्णु-श्रीराम-श्रीकृष्णजी वाला ही तत्त्वज्ञान दिया जिसमें जीव-ईश्वर-परमेश्वर का बातचित सहित साक्षात दर्शन कराया । उन्होने आगे कहा कि किसी भी जिज्ञासु के जीवन का उद्देश्य है भगवान को पाना न कि गुरु को पाना । भगवान के मिलने पर ही मुक्ति-अमरता का साक्षात् बोध प्राप्त होता है । इसलिये किसी भी सच्चे जिज्ञासु को गुरु में नहीं चिपकना चाहिये। उस ‘एक’ भगवान को खोजने में सच्चा गुरु भी मिल जायेगा किन्तु गुरु मात्र में चिपके रहने पर भगवान तो मिलेगा ही नहीं, सच्चा गुरु भी नहीं और मोक्ष भी नहीं मिलेगा जो मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य है । फिर भक्ति-सेवा का प्रयोजन ही क्या रह गया ? और जब भक्ति-सेवा का कुछ प्रयोजन ही नहीं, तो गुरु की आवश्यकता ही क्या रही ? क्योंकि महत्त्व भगवान की है, गुरु की नहीं।

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