“ मनुष्य का पुरुषार्थ ‘धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष’ --महात्मा रोहित दास।”
लखीमपुर खीरी Sep 17, 2025 at 07:22 PM , 838हाथिगवां लखीमपुर। सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के तत्वावधान में हथिगवां , कुंडा, प्रतापगढ़ में चलरहे सत्संग कार्यक्रम में महात्मा रोहित दास ने कहा कि शास्त्र जनित मनुष्य का पुरुषार्थ धर्म-अर्थ-काम-और मोक्ष है। हमारे जीवन के लिये दो क्षेत्र हैं जिसमें रहते हुये जीवन जिया जाता है। पहला संसार और शरीर के बीच अथवा कर्म और भोग के बीच वाला जीवन और दूसरा परमात्मा अथवा धर्म और मोक्ष के बीच वाला जीवन । दोनों क्षेत्रों का गुण-लक्षण, उपलब्धि, प्रभाव, गति और परिणाम भिन्न-भिन्न हैं। मनुष्य की चाहिए कि दूसरा अर्थात पुरुषार्थ वाला जीवन जिए क्योंकि कर्म और भोग के बीच के जीवन का रख-रखाव और मालिकान ‘माया’ के हाथ में है जिसका काम हमेशा जीव को नचाना तडपाना यानि दुःख-कष्ट देना । माया चैरासी की चक्कर लगवाती है । कर्म और भोग वाला जीवन अन्तहीन कामनाओं से भरा-पूरा होता है इसलिए पुर्ति के लिये व्यक्ति को अर्थ जुटाने में चोरी, बेइमानी, झुठ-छलावा आदि का ही सहारा लेकर सारा जीवन बेच देना पड़ता है।
दूसरे तरफ ‘सत्य क्षेत्र’ भगवद् क्षेत्र वाला जीवन पुरुषार्थ वाला जीवन होता है। धर्म और मोक्ष के बीच के जीवन का रख-रखाव और मालिकान ‘परमेश्वर या खुदा-गाॅड-भगवान’ के हाथ में है जो सत्यप्रधान उन्मुक्तता और अमरता से युक्त सर्वोच्चता और सम्पुर्णता वाला होता है। जिसमेें कामनाओं के लिये कोई जगह ही नहीं रहती है । कामना आ भी जाये तो हर प्रकार से पुर्ति हेतु ‘अर्थ’ पहले से ही उपस्थित रहता है । ऐसा इसलिये क्योंकि धर्म वाले जीवन का सर्वेसर्वा (कर्ता-भरता-हरता) स्वयं परमेश्वर है। अर्थात् परमेश्वर कामनाओं से रहित भरा-पुरा समृद्ध सम्पन्न और उन्मुक्त-अमर जीवन वाला बनाता है जो कामनाओं से रहित उन्मुक्त रहेगा वही निःस्वार्थी, निष्कामी कहलायेगा और उसी से ही परमेश्वर का भक्ति-सेवा हो सकता है। जिसने अपने को धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष के बीच रखा है उसी को पुरुषार्थी भी कहते हैं ।






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