खरीफ फसलों की देखभाल हेतु कृषि वैज्ञानिक की सलाह

लखीमपुर खीरी , 109

धान, मक्का, ज्वार-बाजरा, उर्द-मूंग में रोग-कीट नियंत्रण के उपाय बताए

लखीमपुर खीरी। खरीफ फसलों की बेहतर पैदावार और रोग-कीट नियंत्रण के लिए कृषि सुरक्षा अधिकारी व कृषि विशेषज्ञ डॉ. सुभाष चंद्र ने किसानों को इस सप्ताह (18 से 24 अगस्त 2025) विशेष सुझाव दिए हैं। उन्होंने कहा कि समय पर समुचित प्रबंधन से फसलें सुरक्षित रहेंगी और उत्पादन में वृद्धि होगी।

डॉ. चंद्र ने धान की फसल को लेकर कहा कि खेत में जलभराव न होने दें और रोपाई वाली धान में 2 से 3 सेंटीमीटर पानी का स्तर बनाए रखें। तना बेधक कीट नियंत्रण के लिए प्रति हेक्टेयर पांच गंध ट्रैप लगाने की सलाह दी। पत्ती मोड़क, तना छेदक व हिस्पा कीट के प्रकोप से बचाव हेतु क्यूनालफास 25 प्रतिशत ईसी (1.5 लीटर) का छिड़काव कारगर बताया। बाढ़ की स्थिति में 25 प्रतिशत यूरिया घोल का पर्णीय छिड़काव करने और रोपाई के 25 से 30 दिन बाद नत्रजन की पहली टॉप ड्रेसिंग करने पर भी जोर दिया। खैरा रोग की रोकथाम के लिए जिंक सल्फेट (5 किलो) और बुझा चूना (2.5 किलो) का छिड़काव करने तथा शीथ ब्लाइट रोग पर नियंत्रण के लिए कार्बेन्डाजिम या कार्बेन्डाजिम+मैन्कोजेब का छिड़काव करने की सलाह दी।

मक्का के संदर्भ में उन्होंने खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था बनाए रखने पर बल दिया। बुआई के 45 से 55 दिन बाद नत्रजन की चौथाई मात्रा टॉप ड्रेसिंग के रूप में देने की बात कही। फॉल आर्मी वर्म से बचाव के लिए क्लोरेन्ट्रानिलीप्रोल, इमामेक्टिन बेनजोइट या थायोमेथाक्साम+लैम्बडा साइहैलोथ्रिन का छिड़काव करने तथा तना छेदक की समस्या से निपटने के लिए डाईमेथोएट 30 प्रतिशत ईसी (1 लीटर) या क्यूनालफास 25 प्रतिशत ईसी (1.5 लीटर) का छिड़काव आवश्यक बताया।

ज्वार, बाजरा और श्रीअन्न की फसलों के बारे में डॉ. चंद्र ने कहा कि 25 से 30 दिन की अवस्था में निराई-गुड़ाई और नत्रजन की पहली टॉप ड्रेसिंग कर देनी चाहिए। दाना बनने की अवस्था में सिंचाई करनी चाहिए, वहीं अधिक वर्षा होने पर जल निकासी का प्रबंध करना जरूरी है। तना छेदक और प्ररोह मक्खी नियंत्रण के लिए क्यूनालफास 25 प्रतिशत ईसी (1.5 लीटर) का छिड़काव करना प्रभावी है।

उर्द और मूंग की फसलों में रोग नियंत्रण पर भी उन्होंने विशेष जोर दिया। पत्ती धब्बा (सर्कोस्पोरा) रोग से बचाव के लिए कार्बेन्डाजिम (1 मि.ली. प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करने की सलाह दी। येलो मोजेक वायरस से प्रभावित पौधों को उखाड़कर नष्ट करने तथा सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु डाईमेथोएट 30 प्रतिशत ईसी (1 लीटर प्रति हेक्टेयर) का छिड़काव करने की बात कही।

अंत में उन्होंने किसानों से अपील की कि बदलते मौसम को देखते हुए समय पर फसल प्रबंधन करें और कृषि विभाग द्वारा समय-समय पर दी जाने वाली सलाह का पालन अवश्य करें, जिससे उत्पादन और लाभ में बढ़ोतरी हो सके।

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