सनातन संस्कृति में वेदाङ्ग महत्वपूर्ण – गुरु सत्यानन्द

लखीमपुर खीरी , 174

के0के0 शुक्ला/हरिशंकर मिश्र 

लखीमपुर खीरी।  सनातन संस्कृति की ज्ञान-परम्परा का आधार वेद हैं। वेदों को "श्रुति" कहा गया है और इन्हें अपौरुषेय, अर्थात् परब्रह्म प्रणीत माना गया है। परंतु इन वेदों का यथार्थ अर्थ, उच्चारण, तथा विधिपूर्वक प्रयोग तभी संभव है जब हम वेदाङ्गों का सहारा लें। इसीलिए वेदों की रक्षा और उनका व्यवहारिक उपयोग सुनिश्चित करने हेतु षड् वेदाङ्ग की व्यवस्था की गई। सनातन विद्यापीठ के संस्थापक गुरु सत्यानंद ने इसको स्पष्ट करते हुए कहा कि 
वेदाङ्ग का अर्थ एवं उद्देश्य--
"वेदस्य अङ्गानि इव अङ्गानि इति वेदाङ्गानि।"
– अर्थात् वेदों के अंग जैसे आवश्यक सहायक विषय।
जैसे शरीर में हृदय, मस्तिष्क, नेत्र, श्वास आदि प्रमुख अंग हैं, वैसे ही वेदों की पूर्णता वेदाङ्गों से होती है।
षड्वेदाङ्ग (छः अंग) हैं –
 शिक्षा – उच्चारण का ज्ञान।
 कल्प – यज्ञ एवं विधियों का विधान।
 व्याकरण – भाषा की शुद्धता।
 निरुक्त – वैदिक शब्दों की व्याख्या।
 छन्दस् – वैदिक छंदों की व्यवस्था।
 ज्योतिष – यज्ञ हेतु समय-निर्धारण।
मनुस्मृति कहती है: “शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दसां च यत्।
ज्योतिषं चेत्यषङ्गानां वेदाङ्गानां च संज्ञया॥”
अर्थात् शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्दस् और ज्योतिष – ये छह वेदाङ्ग हैं।
वेदों का गूढ़ अर्थ, उनका लयबद्ध गायन, तथा अनुष्ठान की सिद्धि बिना वेदाङ्गों के असंभव है। यह भी कहा गया है:
 "वेदोऽखिलो धर्ममूलम्, स्मृतिशीले च तद्विदाम्।"
 इस धर्ममूल वेद का “मूल ज्ञान” केवल वेदाङ्गों से संभव है।

वेदाङ्गों का सांस्कृतिक महत्व--
१. शिक्षा –  “स्वरार्थो वर्णसंयोगः मात्राकाललयः स्वराः।”
स्वर, उच्चारण, लय इत्यादि के बिना मंत्र का अर्थ ही बदल सकता है। अतः वैदिक वाणी की रक्षा में इसका योगदान अनन्य है।
२. कल्प – समाज में यज्ञ, संस्कार, विवाह, श्राद्ध, उपनयन आदि की विधियाँ कल्पसूत्रों से ही व्यवस्थित होती हैं। यह धर्म का व्यवहारिक रूप है।
३. व्याकरण – पाणिनि कृत अष्टाध्यायी को विश्व का सबसे प्राचीन और वैज्ञानिक व्याकरण माना गया है। यह भाषा की शुद्धता का रक्षक है।

४. निरुक्त – यास्क ऋषि के अनुसार – “नैनं विना ब्राह्मणो वेद श्रोतुमर्हति।”
बिना निरुक्त जाने कोई ब्राह्मण वेद का श्रवण करने योग्य नहीं होता। इसका कार्य दुर्बोध वैदिक शब्दों का व्युत्पत्तिमूलक अर्थ बताना है।
५. छन्दस् – छन्दों के अनुशासन से ही ऋचाएँ संगीतमयी, स्मरणीय और प्रभावकारी बनती हैं। गायत्री, अनुष्टुप्, त्रिष्टुप् जैसे छन्दों में ही ऋचाएँ रची गई हैं।
६. ज्योतिष – “कालो हि यज्ञस्य साधनम्।” (श्रौत सूत्र)
उन्होंने आगे कहा कि काल-ज्ञान के बिना न यज्ञ सिद्ध होता है, न पर्व। वेदांग ज्योतिष प्राचीनतम ज्योतिष ग्रंथ है, जो वैदिक कर्मों में काल की भूमिका सुनिश्चित करता है।
   अतः वेदाङ्गों की उपयोगिता केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं, वे आज भी भारतीय संस्कृति की रीढ़ हैं – संस्कारों से लेकर वास्तु, संगीत, आयुर्वेद और नीति तक। वेदों की आत्मा को यदि शब्द दें तो वे वेदाङ्ग के माध्यम से ही प्रकट होती है।
इसलिए यह कहा जाता है:
"वेदार्थं वेदवेद्यं च वेदाङ्गैरवगम्यते।
वेदवाणीं समाचक्षेन्मनसा कर्मणा गिरा॥"
अर्थात् वेदों का अर्थ, देवता और स्वरूप – इन सबका बोध केवल वेदाङ्गों के अभ्यास से संभव है।

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