३ दिवसीय सत्संग,भजन-कीर्तन एवं श्रीराम नवमी महोत्सव कार्यक्रम

लखीमपुर खीरी , 665

साड़ी महानगा/लखीमपुर। सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस द्वारा संस्थापित संस्था सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के तत्त्वावधान में श्रीराम नवमी के पावन अवसर पर 4 अप्रैल से भगवद धाम आश्रम, महानगा, साड़ी, सिद्धार्थनगर में धर्म-धर्मात्मा-धरती रक्षार्थ सत्य-धर्म-न्याय-नीति संस्थापनार्थ 3 दिवसीय सत्संग एवं भजन कीर्तन कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। उक्त कार्यक्रम 6 अप्रैल तक चलेगा। संस्था के  प्रभारी कमल जी ने कहा आज भ्रष्टाचार से धर्म क्षेत्र भी मुक्त नहीं है क्योंकि भगवान् एक था एक है एक ही रहने वाला है,वह परम सत्ता शक्ति है जो दो भी नहीं होता परन्तु आज हर महत्वाकांक्षी गुरु जी लोग सद्गुरु, जगतगुरु, श्री श्री श्री 108 श्री अनंत श्री आदि आदि पदवी ले लेकर अपने शिष्यों में भगवान् बन रहे हैं और उनके धन और धर्म भाव का शोषण कर रहे हैं , जब की ये गुरु जी लोग शरीर में रहने वाले चेतन जीव को भी नहीं जानते और न परमात्मा को ही जानते हैं , नाजानकारी में आत्मा को ही जीव और आत्मा को ही परमात्मा घोषित करने कराने में लगे हैं, जबकि हर मामला में तीनों तीन अलग अलग हैं। तीनों का नाम-रूप-गुण-लक्षण-प्रभाव-उपलब्धि-विधान सब अलग अलग है।
             सत्संग करते हुए महात्मा शिवानन्द जी ने कहा, भगवान विष्णु-राम-कृष्णजी ने जिस ‘तत्त्वज्ञान’ को अपने समर्पित-शरणागत भक्त-सेवकों को देकर परमेश्वर के जिस विराटरूप का साक्षात् दर्शन कराया था, सन्त ज्ञानेश्वर जी ने अपने भक्त-सेवकों को उसी तत्त्वज्ञान को ही देकर जीव-आत्मा-परमात्मा का आमने-सामने बातचीत के साथ साक्षात दर्शन कराया है । महात्मा जी ने आगे कहा की उस तत्त्वज्ञान में यह स्पष्ट दिखलाई दिया की श्री विष्णु-राम-कृष्ण के शरीर में अवतरित हो कर जिस परमतत्त्वम परमात्मा ने कार्य किया था , आज सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस के शरीर में अवतरित होकर  उसी परमतत्त्वम ने धर्म संस्थापन का कार्य किया है। अगर कोई जांच करना चाहता है तो इस संस्था में उक्त जांच का भी प्रावधान है। महात्मा जी ने आगे कहा कि इस संस्था का एकमात्र उद्देश्य धर्म-धर्मात्मा-धरती की रक्षा ही है। असत्य-अधर्म-अन्याय-अनीति को समूल समाप्त कर सत्य-धर्म-न्याय-निति को समाज में लागू करने हेतु सन्त ज्ञानेश्वर जी के सकल शिष्य समाज संकल्पित एवं समर्पित हैं।

Related Articles

Comments

Back to Top