पाशुपत धर्म विवेचन.. गुरु सत्यानन्द (शिवरात्री विशेषांक) सनातन विद्या पीठ

लखीमपुर खीरी , 128

(प्रस्तुति के0के0शुक्ला)

शिव कहते हैं .. 
हे महादेवि ! पाशबद्धता का अभिशाप देने वाले व्रत पशुव्रत कहलाते हैं। ऐसे अनेक व्रत लोक में प्रचलित हैं और इनको करने वाले पशुश्रेणी के मनुष्य इन पशुव्रतों में ही अपना भला भी देखते हैं। ऐसे जन मूढ़बुद्धि और दाम्भिक होते हैं। किन्तु जो कौलमार्ग के फलरूप महाभाव को उपलब्ध होकर कौलमार्ग का अनुशरणरत हैं, वे महात्मा पुरुष दुर्लभ हैं। उनका सत्संग तो और भी दुर्लभ है। कुलतत्त्वविशारद व्यक्ति दुर्लभ है।
     हे भवानी ! तुम्हारी करुणा से वंचित रहने वाले अभागे तो निरन्तर कदाचरण और अपथ्य सेवन में ही परायण होकर अनायास ही अपने अहित में सर्वदा तत्पर रहते हैं। कस्तूरी को कीचड़ की बुद्धि से, कर्पूर को साधारण नमक की बुद्धि से, चीनी को बालुका  बुद्धि से, मणि को काँच की भावना से पामर लोग सदा उपेक्षित कर देते हैं । मूल्यवान बस्तु के समीप होकर भी सम्बन्धित अज्ञता के कारण बस्तु खो देते हैं, सम्मुख होकर भी पहचान नही पाते । मोह की इस प्रकार की महत्ता आश्चर्य ही है। यह मोह तुम्हारी माया का ही प्रभाव है। इस मोह का प्रभाव तो देखो कि यह अज्ञों को तो मोहमुग्ध करता ही है किन्तु यह देवों और महाज्ञानियों तक के चित्त को भी मोहमुग्ध कर देता है। 
     कौलमार्ग में मद्य पेय है, मांस खाद्य में परिगणित है, प्रिया का मुख ही परम दर्शनीय है। इसप्रकार के आचरण को जप के सदृश बारम्बार अनुवर्तित करना यहाँ विहित है। इसतरह परम पद यहाँ सहज ही प्राप्त हो जाता है। इसप्रकार का प्रचार प्रचार मात्र ही है। इन तथ्यों के वास्तविक रहस्य का ज्ञान तो गुरुदेव से ही हो सकता है।
    कहने के लिए तो कुछ लोग महान गुरु कहे जाते हैं। किन्तु इनका दुर्भाग्य यह होता है कि, ये गुरुदेव के महान उपदेशों से पूरी तरह रहित होते हैं। स्वयं पूर्वजन्मों के मोहपाश और इस जन्म के अनुपदेशमय व्यवहार में आमूलचूल डूबे लोग दूसरों को सत्पथ पर जाने से रोक देते हैं। इसप्रकार के पतित कर्म से ये विरत भी नही होते। 
     कुछ पामर तो स्वयं दुराचरण में लिप्त रहते हैं किन्तु दुसरों को उपदेशपूर्ण पत्रावलियों का वाचन कर ठगने के कृत्य में अनवरत लिप्त रहते हैं। ऐसे पापाचरण में लिप्त गुरुओं की ऐसी दशा है तब उनके अज्ञानी अनुयायियों की क्या दशा हो सकती है ? मिथ्याज्ञान की विडम्बना में आडम्बरपूर्ण जीवन व्यतीत करने वाले अधिकतर जन कौल मार्ग के विधान की मनगढन्त परिभाषा बनाकर उसी का प्रचार करते रहते हैं । ऐसे लोग परम्पराज्ञान और मर्यादा विहीन होते हैं मात्र बौद्धिक प्रकल्पन के शिकार होते हैं।
 भला मद्यपान ही यदि सिद्धि का कारण हो तो अन्य रहस्यों का महत्व ही क्या रह जाएगा ? इस तरह तो सारे मद्यपी और पामर सिद्ध हो जाएं। मद्यपान का रहस्य जानना आवश्यक है। इसी तरह मांसभक्षण से यदि उत्तम सद्गति होने लगे तो पूर्णमांसाहारी तो बिना प्रयास ही पुण्यात्मा होकर मुक्त हो जाएं। इसीप्रकार यदि प्रियामुख दर्शन और शक्तिरूपा स्त्रियों के समागम से ही मुक्ति होने लगे तो बड़े बड़े सुन्दरी सेवी तो सहज ही मुक्तिपथ पूर्ण कर लें।  बस्तुतः आचारहीनता ही निन्दनीय होती है। आचारहीन मनुष्य निन्दा के पात्र होते हैं। आचारवान मनुष्य सदा सम्मानित होते हैं। 
पशु भाव वाले साधक के लिए मद्य, मांस को सूंघना भी बर्जित है । उसे मांस मदिरा का दर्शन तक नही करना चाहिए, सेवन की तो बात सोचना भी निषिद्ध है । कौल मार्ग साधना में इन सबका प्रयोग दूसरे स्तर से आरम्भ होता है। उच्चस्तर की साधना में ये महाफलप्रद स्वीकृत हैं।

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