तीर्थराज प्रयाग यात्रा उपरांत मनोभाव,महाकुंभ की महिमा अनंत
लखीमपुर खीरी Feb 21, 2025 at 07:43 PM , 139लखीमपुर खीरी।कहने को, कोई कुछ भी कहे तीर्थराज प्रयाग और महाकुंभ की बात ही निराली है...
रोज करोड़ की संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थित और असीम उत्साह, पावन त्रिवेणी संगम में स्नान, अक्षयवट और श्री हनुमान जी के दर्शन, भारी सहभागिता के बावजूद नियम, संयम और अपार श्रद्धा के साथ सपरिवार आगमन, पूजन, आस्था एवं दान-पुण्य संग विशाल संगम क्षेत्र में भ्रमण।व्यवस्था, देखभाल और सेवा संरक्षण हेतु महीनों से लगी सेवादारों, पुलिस-सेना, चिकित्सकों, संरक्षकों की टुकड़ियां और विभिन्न साधु-संतों, अखाड़ों के भव्य आयोजन, पंडाल, अनवरत चलती कथाएं, यज्ञ, भंडारे एवं भोज प्रसाद वितरण की निःशुल्क व्यवस्था, निरंतर साफ-सफाई , देश विदेश से आने वाले श्रद्धालु तथा शासन-प्रशासन की सतत कार्य प्रणाली, स्थानीय नगर वासियों सहित सभी श्रद्धालुओं की सहन शक्ति और जुड़ाव आदि दर्शाते हैं कि,हमारी सनातन संस्कृति अद्भुत, अद्वितीय और लाज़वाब है,महाकुंभ का पावन अवसर और आनंद बेहिसाब है"तब भी कि जब सुरक्षा - व्यवस्थादि के चलते श्रद्धालुओं को मीलों चलना पड़ता हैं, कहीं-कहीं और बहुधा असुविधा और कष्टों का सामना करना पड़ता हो, कई बार आधिक्य भुगतान और भटकन का सामना करना पड़े फिर भी हर कंठ से एक ही स्वर,वाह, जीवन धन्य हो गया, हर-हर गंगे" गुंजायमान हो
तो समझ लेना चाहिए कुंभ है...महाकुंभ है,निज संग पूर्वजों के शुभ कर्मों का सुफल अनंत है,हरि इच्छा से श्रद्धा-भक्ति, धर्म, पुण्य कर्मों, संस्कृति का बसंत है।जरा सोंच कर तो देखें कि हम तीर्थयात्री भारी जनसमूह, दूरी, कतिपय व्यवस्था सम्बन्धी जटिलताओं अथवा सामयिक व्यवधान आदि को देख कुछ ही देर में विचलित हो जाते हैं तो विचार करें महीनों से दिन रात चौबीसों घंटों से जुटे जुड़े सेवा, सहयोग, सुरक्षा कर्मियों की मनोस्थिति का भी... कि अपने परिवार से दूर रहकर, अथक-एकटक, अनवरत व्यवस्था में लगे रहते हैं बगैर भूख प्यास की चिंता किए.! भला क्यों..? क्योंकि हम सब सुरक्षित, संरक्षित रहकर संगम स्नान का पुण्य प्राप्त कर सकें।बस हम सभी को नियम, संयम और अनुसान का पालन करना है साथ ही उकसावे, बहकावे, भटकाव से नितांत दूर रहना हैकुल मिलाकर हमारा तो बस यही कहना है कि...सद्कर्म-सौभाग्य से,मिलता है अवसर भाग्य से
हो प्रभु कृपा जिन पर,लगा पाते वही डुबकी घाट पे,राम जी ,राम मोहन गुप्त 'अमर'।






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