कर्म अकर्म क्या है ? गुरु सत्यानन्द जी सनातन विद्या पीठ

लखीमपुर खीरी , 119

(प्रस्तुति के0के0शुक्ला)
ॐ तत्सत्
श्री सद्गुरु चरण कमलेभ्यो नमः। 
कर्म-अकर्म ...
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं--
 हे अर्जुन! कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इस विषय में विद्वान पुरुष भी मोहित हैं ।इससे मैं तुझे वह कर्म बताऊंगा, जिसे जान कर तू अशुभ (संसार बन्धन) से छूट जाएगा। 
 कर्म को भी जानना चाहिए , अकर्म को भी जानना चाहिए और विकर्म को भी जानना चाहिए । कारण कि कर्म की गति गहन है।
 यहाँ कर्म शब्द से फलाभिसंधिरहित भगवदाराधन रूप कर्म विवक्षित है।                       " फलाभिसंधिरहितं भगवदाराधन रूपं कर्म; "।
  अकर्म शब्द से कर्ता "आत्म् " का यथार्थ स्वरुप ज्ञान कहा गया है। " अकर्म  इति कर्तु: आत्मनो याथात्म्यज्ञानम् उच्यते।" 
 नित्य, नैमित्तिक और काम्यरूप से तथा उनके साधन द्रब्योपार्जनादि -- रूप से विविध भावों को प्राप्त कर्म विकर्म कहलाते हैं। " मोक्ष साधनभूते कर्मणः स्वरूपे बोद्धव्यं अस्ति  ;विकर्मणि च नित्यनैमित्तिक काम्य कर्मरूपेण तत्साधनद्रब्य अर्जनाद्याकारेण च , विविधताम् आपन्नम् कर्म विकर्म ।"  
 इस प्रकार 'अकर्म ' शब्द से कर्म से अतिरिक्त जो आत्मज्ञानुसंधान है, उसको प्रकट किया है। कर्तृत्वाभिमान का अभाव अकर्म के लक्ष्य रूप आत्मज्ञान की प्राप्ति कराता है। 
क्रियमाण कर्मं को "आत्म्" के यथार्थ स्वरुप का अनुसंधान रहने के कारण जो "आत्मज्ञान" रूप समझता है,  साथ ही जो कर्मों के अंतर्गत आ जाने के कारण उस आत्मज्ञान को कर्मरूप समझता है । वही यथार्थ समझता है।  
जो कर्म-फल की आसक्ति को त्याग कर नित्य (आत्मा) तृप्त और निराश्रय (प्रकृति के आश्रय से रहित ) है, वह पुरुष कर्म में भली--भाँति प्रवृत्त हुआ भी कुछ भी नही करता। 
भगवत् कृपा हि केवलम् ।

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