“ईश्वर और परमेश्वर में बहुत बड़ा अन्तर है : महात्मा दीपक जी
लखीमपुर खीरी Jan 27, 2025 at 04:20 PM , 580“भगवत् कृपा ही केवलम्”
महाकुम्भ नगर प्रयागराज/लखीमपुर।
सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस द्वारा संस्थापित संस्था सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के तत्त्वावधान में महाकुंभ मेला हरिश्चंद्र चौराहा स्थित शिविर में सत्संग सुनाते हुए महात्मा दिपक दास ने कहा, लोग जीव को ही ईश्वर और ईश्वर को ही परमेश्वर घोषित करते हुये समाज में एक बहुत बड़ा भरमाव-भटकाव पैदा करते आ रहे हैं जबकि ये तीनों अर्थात जीव-ईश्वर-परमेश्वर तीनों ही नाम, रूप, स्थान, गुणवत्ता, लक्षण, सामर्थ्य-क्षमता, प्रभाव व कार्यक्षेत्र आदि सभी मामले में पूर्णतया भिन्न-भिन्न हैं ।
इन तीनों में अन्तर समझाने के लिये महात्मा जी ने पानी से भरे घड़े, प्रकाश और आकाशीय सूर्य का उदाहरण प्रस्तुत करते हुये बताते हैं कि जिस प्रकार आकाशीय सूर्य से पृथक होकर आ रहे प्रकाश का पानी के घड़े में पड़ने से घड़े में एक सूर्यवत् गोला बन जाता है, ठीक उसी प्रकार परमात्मा-परमेश्वर से प्रकट और पृथक हुये आत्म-ज्योति रूप आत्मा-ईश्वर-ब्रम्ह हाँड-माँस-खून वाले इस शरीर मे स्वाँस के माध्यम से प्रवेश कर जीव बन जाता है जो परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान का प्रतिविम्बित रूप होता है अर्थात् जिस प्रकार आकाशीय सूर्य एकमात्र एक ही होता है किन्तु उससे पृथक हो रही किरणें अनेकानेक हैं तथा घड़ों में घुसकर अनेकानेक प्रतिविम्ब बना रही हैं, उसी प्रकार परमेश्वर एकमात्र एक ही है और एक देशीय है जो परमधाम या अमरलोक में रहता है केवल अवतारबेला में अवतारी शरीर में रहता है, उससे प्रकट और पृथक हो रहे आत्मा-ईश्वर-ब्रम्ह-नूर-सोल संख्या में अनेक हैं जो शरीर-शरीर में घुसकर अलग-अलग जीव में बदलते जा रहे हैं ।
महात्मा जी ने यह भी बताया कि इन तीनों को पृथक्-पृथक् जानने, साक्षात् देखने व परिचय-पहचान पाने की पद्धति भी भिन्न-भिन्न ही हैं जिन्हें क्रमशः स्वाध्याय (स्व का अध्ययन विधान) एवं अध्यात्म (आत्मा-ईश्वर-ब्रम्ह का साधनात्मक विधान) और तत्त्वज्ञान (परमतत्त्व रूप परमात्मा-परमेश्वर का भक्ति-सेवात्मक विधान) कहते हैं। इन तीनों प्रकार के विधान में क्रमशः सूक्ष्म दृष्टि एवं दिव्य दृष्टि और ज्ञान-दृष्टि द्वारा उन्हें अलग-अलग साक्षात् देखने को मिलता है और परमेश्वर के दर्शन में मुक्ति-अमरता का साक्षात् बोध भी तत्क्षण प्राप्त होता है । मानव जीवन का चरम और परम लक्ष्य इसी ज्ञान को पाना होता है। महात्मा जी ने कहा यही ज्ञान हमको हमारे सदगुरु सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस से मिला है।































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