“गायत्री मंत्र नहीं देव मंत्र कहिए देव विस्थापन का कार्य असुरता--सन्त ज्ञानेश्वरजी ।”
लखीमपुर खीरी Jan 12, 2025 at 06:25 PM , 164प्रयागराज/लखीमपुर।
सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस द्वारा संस्थापित संस्था सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के तत्त्वावधान में महाकुंभ मेला हरिश्चंद्र चौराहा स्थित शिविर में सत्संग में बोलते हुए महात्मा अनिरुद्धाचार्य ने कहा,
चौबीस मात्रा में पूर्ण होने वाले तथा गाया जाने वाले पद्य को गायत्री छन्द कहते है । गायत्री कोई देवी तो है ही नहीं, गायत्री कोई मन्त्र भी नहीं है । गायत्री तो अनुष्टुप और त्रिष्टुप की तरह ही व्याकरण का एक छन्द मात्र है जिसमें बहुचर्चित वेद मन्त्र ‘ ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्’ रूप देव मन्त्र उल्लिखित है । ‘देवस्य’ जो पुलिंग सूचक देव है, इस मन्त्र का अभीष्ट है जिससे हमारी बुद्धि को शुद्ध रखने और ‘सत्य’ के प्रति उत्प्रेरित रहने हेतु प्रार्थना की गयी है ।
जिज्ञासुओं के शंकाओं का समाधान करते हुये महात्मा जी ने आजकल प्रचारित तथाकथित गायत्री मन्त्र के बारे में रहस्योद्घाटन करते हुये कहा कि वेद के इस मन्त्र का अभीष्ट कोई देवी नहीं अपितु ॐ-देव है । अतः जो लोग इस मन्त्र के पीछे किसी भी स्त्री रूपा काल्पनिक और झूठी देवी को स्थापित करते-करवाते हैं, वे समाज को ॐ देव से विमुख करते हुये उन्हें दिग्भ्रमित करते हैं । गायत्री छन्द के नाम पर काल्पनिक और झूठी देवी को स्थापित करना देव द्रोहिता नहीं तो और क्या है ? निःसंदेह यह समाज के धन, धर्म और श्रद्धा भाव का दोहन और शोषण है ।
महात्मा जी बताते हैं कि इस मन्त्र के किसी भी शब्द का अर्थ परमात्मा नहीं है और न ही किसी शब्द का अर्थ गायत्री ही है । यह मन्त्र उस देव का है जो सूर्य का भी वरणीय है । परमात्मा तो उस ॐ-देव को भी उत्पन्न करने वाला और उसका पितामहरूप परमदेव है।































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