“लौकिकता की तरह पारलौकिकता भी पूरी तरह जानने देखने में”

लखीमपुर खीरी , 137

महाकुंभ मेला/लखीमपुर।
सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस द्वारा संस्थापित संस्था सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के तत्त्वावधान में 8 जनवरी से 10 फरवरी तक महाकुंभ मेला प्लॉट नंबर 22 सेक्टर 18 हरिश्चंद्र चौराहा, लोअर संगम मार्ग स्थित शिविर में आज पहला दिन के सत्संग में बोलते हुए महात्मा सेवादास ने बताया कि लौकिक और पारलौकिक दो ऐसे शब्द हैं जो हमारे जीवन के सम्पूर्णता को लिये हुये हैं अर्थात् हमारा सम्पूर्ण जीवन दो भागों में बँटा हुआ है जिसमें नीचे से ऊपर की ओर चलेंगे तो पहला लौकिक और दूसरा पारलौकिक है । लौकिकता में जिस प्रकार शरीर, परिवार और संसार तीनों ही दिखाई दे रहा है, ठीक उसी प्रकार पारलौकिकता वाले जीव, ईश्वर और परमेश्वर तीनों भी दिखाई देते हैं । अगर मानव जीवन को संपूर्ण रूप से जानना होगा तो पारलौकिकता को भी जानना अत्यंत जरूरी है । जिस तरह शरीर-परिवार व संसार प्रधान जीवन लौकिक जीवन है तो ठीक उसी तरह जीव-ईश्वर व परमेश्वर प्रधान जीवन पारलौकिक जीवन कहलाता है। उन्होंने कहा सच्चे सदगुरु के शरण में पारलौकिकता भी पूरी तरह देखने जानने को मिलता है और हम आप लोगों को यहीं पारलौकिकता जनाने बताने समझाने आए हैं । 
                 उन्होंने आगे कहा कि परमेश्वर से उसके ईश्वरीय शक्ति-सत्ता के माध्यम से आये हुये जीव को संसार से माता-पिता के माध्यम से आया हुआ यह शरीर इसलिये प्राप्त हुआ कि वह जीव अपने सर्वेसर्वा परमेश्वर का सदा-सर्वदा बने रहकर उसके मायावी खेल रूपी इस संसार को यथार्थतः जानते-देखते हुये लौकिक और पारलौकिक दोनों जीवन का भरा-पूरा आनन्द लेवे और अन्त में वापस अपने परमप्रभु परमेश्वर के पास चला जाये, न कि वह अपने प्रभु को भूलकर इस मायावी खेल में रच-पच कर इसी में भटकता रहे । यह संसार फँसने-फँसाने के लिये नहीं बल्कि परमेश्वर का बने रहकर इसके यथार्थता को भगवद् विधान रूप तत्त्वज्ञान के अन्तर्गत अच्छी प्रकार जान-देखकर उस ज्ञान के अनुसार रहते-चलते हुये अर्थात् परमेश्वर प्रधान जीवन यापन करते हुये इस संसार का उपभोगी बनने के लिये है। दोनों ही भगवद् विधान के अनुसार रहने-चलने वालों को सुस्पष्टतः दिखाई देता है। हम सभी को यह ज्ञात होना चाहिये कि पारलौकिकता के पीछे-पीछे लौकिकता को अपने मर्यादा के लिये दौड़ते हुये आना ही आना है, किन्तु लौकिकता का जीवन जीने की चाहत रखने वालों से पारलौकिकता तो छूटती ही छूटती है, लौकिकता भी आगे-आगे भागती रहती है। उन्हें सदा ही लौकिकता के लिये हाय-हाय की आह अथवा और-और की दौड़ मचानी ही पड़ती है ।

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