ईश्वर और परमेश्वर में बहुत बड़ा अन्तर है । --सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस

लखीमपुर खीरी , 619

लखीमपुर खीरी /माघमेला,प्रयाग राज।
प्लॉट नं 36 सेक्टर नं 2 स्थित सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के पण्डाल में सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस से तत्त्वज्ञान प्राप्त महात्मा दीपक जी ने सत्संग में सुनाया कि लोग जीव को ही ईश्वर और ईश्वर को ही परमेश्वर अथवा रूह को ही नूर और नूर को ही अल्लाहतआला अथवा सेल्फ को ही सोल और सोल को ही गॉड घोषित करते हुये समाज में एक बहुत बड़ा भरमाव-भटकाव पैदा करते आ रहे हैं जबकि ये तीनों नाम, रूप, स्थान, गुणवत्ता, लक्षण, सामर्थ्य-क्षमता, प्रभाव व कार्यक्षेत्र आदि सभी मामले में पूर्णतया भिन्न-भिन्न हैं ।
इन तीनों में अन्तर समझाने के लिये महात्मा जी ने पानी से भरे घड़े, प्रकाश और आकाशीय सूर्य का उदाहरण प्रस्तुत करते हुये बताते हैं कि जिस प्रकार आकाशीय सूर्य से पृथक होकर आ रहे प्रकाश का पानी के घड़े में पड़ने से घड़े में एक सूर्यवत् गोला बन जाता है, ठीक उसी प्रकार परमात्मा-परमेश्वर से प्रकट और पृथक हुये आत्म-ज्योति रूप आत्मा या दिव्य ज्योति रूप ईश्वर (या ब्रम्ह-ज्योति रूप ब्रम्ह या आलिमे नूर या डिवाइन लाइट रूप सोल) हाँड-माँस-खून वाले इस शरीर मे स्वाँस के माध्यम से प्रवेश कर जीव बन जाता है जो परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान का प्रतिविम्बित रूप होता है । अर्थात् जिस प्रकार आकाशीय सूर्य एकमात्र एक ही होता है किन्तु उससे पृथक हो रही किरण अनेकानेक हैं तथा घड़ों में घुसकर अनेकानेक प्रतिविम्ब बना रही हैं, उसी प्रकार परमेश्वर एकमात्र एक ही है और एक देशीय है जो परमधाम या अमरलोक या बिहिश्त या पैराडाइज में रहता है केवल अवतारबेला में अवतारी शरीर में रहता है, उससे प्रकट और पृथक हो रहे आत्मा-ईश्वर-ब्रम्ह-नूर-सोल संख्या में अनेक हैं जो शरीर-शरीर में घुसकर अलग-अलग जीव में बदलते जा रहे हैं । पुनः जिस प्रकार घड़े के अन्दर वाला सूर्य का गोला का प्रतिबिम्ब  एवं उस प्रतिविम्ब और आकाशीय सूर्य के बीच यात्रा कर रहे सूर्य का प्रकाश और अकेला आकाशीय सूर्य तीनों हर मामले में भिन्न-भिन्न हैं, उसी प्रकार जीव एवं ईश्वर और परमेश्वर तीनों ही हर प्रकार से भिन्न-भिन्न हैं । 
महात्मा जी ने यह भी बताया कि इन तीनों को पृथक्-पृथक् जानने, साक्षात् देखने व परिचय-पहचान पाने की पद्धति भी भिन्न-भिन्न ही हैं जिन्हें क्रमशः स्वाध्याय (स्व का अध्ययन विधान) एवं अध्यात्म (आत्मा-ईश्वर-ब्रम्ह का साधनात्मक विधान) और तत्त्वज्ञान (परमतत्त्व रूप परमात्मा-परमेश्वर का भक्ति-सेवात्मक विधान) कहते हैं। इन तीनों प्रकार के विधान में क्रमशः सूक्ष्म दृष्टि एवं दिव्य दृष्टि और ज्ञान-दृष्टि द्वारा उन्हें अलग-अलग साक्षात् देखने को मिलता है और परमेश्वर के दर्शन में मुक्ति-अमरता का साक्षात् बोध भी तत्क्षण प्राप्त होता है । गुरु के प्राप्त होने वाले ज्ञान में यदि ये तीनों विधान न प्राप्त हो रहे हों तो समझिये वह ज्ञान सही नहीं और जब वह ज्ञान सही नहीं तो वह गुरु ही सही कैसे हो सकता है ? फिर उस गुरु के पूर्णगुरु या सद्गुरु होने का प्रश्न ही कहाँ पैदा होता है ! जब वह गुरु गुरु ही नहीं तो वह शिष्य शिष्य ही कैसे ? श्रोताओं को आगाह करते हुये महात्मा जी ने कहा कि गुरु और शिष्य के बीच भगवान का साक्षात् दर्शन कराने वाले और मोक्ष का साक्षात् बोध कराने वाले ज्ञान का ही सम्बन्ध होता है, न कि धन-दौलत महल-अट्टालिका या आश्रमादि। इस ज्ञान में भगवान के विराटरूप का साक्षात् तत्त्वतः दर्शन और बात-चीत सहित परिचय-पहचान भी प्राप्त होता है । साथ ही साथ मुक्ति अमरता का साक्षात् बोध भी ज्ञान प्राप्ति के समय प्राप्त होता है । मानव जीवन का चरम और परम लक्ष्य इसी ज्ञान को पाना है और महात्मा जी ने कहा यही ज्ञान हमें हमारे सदगुरु सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस से मिला ।

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