बजट होगा तब बनेगा रास्ता कीचड़ में डूबा स्वास्थ्य तंत्र, अधिकारियों की बेशर्मी ने खोली सरकार के दावो की पोल एक सप्ताह से बंद आयुष्मान मंदिर में मरीजों की चीख अनसुनी

लखीमपुर खीरी , 0

न रास्ता, न डॉक्टर: गर्भवती महिलाओं का टीका आशा के घर के बरामदे में, अजान में गर्भवती महिलाएं कीचड़ में फिसलने को मजबूत 

गोला गोकर्णनाथ खीरी, उत्तर प्रदेश सरकार एक ओर 'हर घर तक स्वास्थ्य सेवा' पहुंचाने का दम भरती है और आयुष्मान आरोग्य मंदिरों तथा होम्योपैथिक चिकित्सालयों पर करोड़ों रुपये खर्च करने के दावे करती है, लेकिन धरातल पर हकीकत बिल्कुल उलट है। ब्लॉक कुंभी क्षेत्र की ग्राम पंचायत अजान की नई बस्ती में स्थित आयुष्मान आरोग्य मंदिर और होम्योपैथिक चिकित्सालय की बदहाली ने सरकार के तमाम दावों की पोल खोल दी है।

अस्पताल तक पहुंचने के लिए रास्ता तो छोड़िए, बरसात के दिनों में यहां घुटनों तक पानी भर जाता है। हल्की बारिश होते ही दोनों अस्पतालों के सामने का पूरा मार्ग कीचड़ में तब्दील हो जाता है। स्थिति इतनी विकराल है कि मरीजों के साथ-साथ डॉक्टरों को भी पैंट उतारकर गंदे पानी और कीचड़ भरे रास्ते से गुजरकर अस्पताल पहुंचना पड़ता है। यह दृश्य सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के दावों पर करारा तमाचा है।

पक्की सड़क न होने से एम्बुलेंस के अस्पताल तक पहुंचने का सवाल ही नहीं उठता। गर्भवती महिलाओं को सेंटर से एम्बुलेंस तक स्वयं पैदल पहुंचना पड़ता है। केंद्र के अंदर दवाएं और व्यवस्थाएं तो उपलब्ध हैं, लेकिन मरीजों के लिए पहुंच मार्ग ही नहीं है। खासकर गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और छोटे बच्चों के लिए यह रास्ता मुसीबत से कम नहीं है। फिसलकर गिरने का खतरा हर पल बना रहता है, और खराब रास्तों के कारण रोजाना कई मरीज बिना इलाज के ही वापस लौटने को मजबूर हो जाते हैं।

ग्रामीण राम निवास वर्मा, बलराम, रामकुमार, शीशुपाल, गंगाराम और सुरेश चंद्र बोक्सा ने बताया कि आयुष्मान आरोग्य मंदिर के सीएचओ संजय कुमार पिछले एक सप्ताह से अस्पताल के सामने जलभराव होने के कारण ड्यूटी पर नहीं आ रहे हैं। अस्पताल के गेट पर ताला लटका है और रोजाना दर्जनों मरीज डॉक्टर की आस लेकर आते हैं और मायूस लौट जाते हैं। सवाल यह है कि जब सीएचओ को जलभराव का बहाना मिल गया, तो क्या अस्पताल बंद रखना ही समाधान है? क्या स्वास्थ्य विभाग के पास कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं थी?

ग्रामीणों का कहना है कि दोनों अस्पतालों तक जाने का कोई सुरक्षित और पक्का मार्ग नहीं है। सालों से यह समस्या बनी हुई है, लेकिन आज तक किसी अधिकारी ने सुध नहीं ली। आशा कार्यकर्ता कमला देवी ने बताया कि अस्पताल जाने का रास्ता न होने और जलभराव के कारण गर्भवती महिलाओं का टीकाकरण अस्पताल में संभव नहीं हो पाता। मजबूरी में एएनएम द्वारा गर्भवती महिलाओं के टीके आशा के घर के बरामदे में बैठकर लगाए जाते हैं। उन्होंने कहा कि अगर अस्पताल तक पक्का रास्ता होता और जलभराव न होता, तो सभी टीके अस्पताल परिसर में ही लगाए जाते। यह खुलासा स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

शिकायत पर अधिकारी का बेफिक्र जवाब: "बजट होगा तब बनेगा रास्ता"

इस समस्या को लेकर ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत दर्ज कर अस्पताल तक पक्का रास्ता बनवाए जाने की मांग की थी। शिकायत पर 8 सितंबर 2026 को ग्राम पंचायत अधिकारी चंद्र प्रकाश वर्मा जांच करने मौके पर पहुंचे। निरीक्षण के बाद उन्होंने शिकायतकर्ता से कहा, "जब बजट होगा, तब अस्पताल जाने का रास्ता बनाया जाएगा।"

अधिकारी के इस बेफिक्र जवाब से ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। ग्रामीणों का सवाल है कि आखिर बजट कब पास होगा और रास्ता कब बनेगा? क्या तब तक आम आदमी, मरीज, गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे इसी तरह गंदे पानी और कीचड़ में चलने को मजबूर रहेंगे? क्या अधिकारियों के पास वैकल्पिक व्यवस्था तक का कोई प्रबंध नहीं है? क्या यह बदहाली अधिकारियों को दिखाई नहीं देती, या वे कुंभकरणी नींद में सोए हैं?

इस संबंध में सीएचसी अधीक्षक डॉ. मयंक मिश्रा ने बताया कि सीएचओ अपनी विभिन्न मांगों को लेकर पूरे प्रदेश में धरना दे रहे हैं, इस कारण वे ड्यूटी पर नहीं आ रहे हैं। 

वहीं इस संबंध में जिलाधिकारी अंजनी कुमार सिंह से बात की गई तो उन्होंने कहा कि "अस्पताल नीचे बन कैसे गया, दिखवाता हूं।" जबकि सीडीओ अभिषेक कुमार ने कहा कि "अभी शिकायत प्राप्त हुई है,  मैं बीडीओ से बात करता हूं, कार्य करा दिया जाएगा।"
यानी हर अधिकारी ने या तो गोलमोल जवाब दिया या जिम्मेदारी दूसरे पर डाल दी। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि एक सप्ताह से अस्पताल पर ताला लटका है और मरीज दर-दर भटक रहे हैं।ग्रामीण अब जिलाधिकारी से अस्पताल तक पक्के रास्ते, अस्पताल के आसपास पक्की नाली और पानी की निकासी की तत्काल मांग कर रहे हैं।

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