आईजीआरएस पर भ्रामक रिपोर्ट लगाकर लेखपाल अधिकारियों को कर रहा गुमराह,

लखीमपुर खीरी , 91

खलिहान की जमीन कब्जा मुक्त कराने में  प्रशासन के छुटे पसीने 

जनसुनवाई पोर्टल पर फिर उठे सवाल, खलिहान की जमीन कब्जामुक्त न होने का आरोप


लखीमपुर-खीरी। जिले में जनसमस्याओं के त्वरित निस्तारण के लिए संचालित जनसुनवाई पोर्टल एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गया है। होता यह है पीड़ित अपनी समस्या का निस्तारण करने के के लिए आनलाईन शिकायत को प्रथम वरीयता देता है उसके बाद सम्बंधित विभागो के चक्कर लगाता है लेकिन उसे नहीं मालूम यह आनलाइन पोर्टल पर शिकायत उसके लिए जी का जंजाल बन जाता है विपक्षियों से सांठगांठ कर लिया जाता उसे बताया जाता है कि आप फंस रहे हो तो विपक्षी सेटिंग गेटिंग कर के अपने पक्ष में आख्या लगवा कर किए गए भ्रष्टाचार पर पर्दा डलवा लेता है अगर निष्पक्ष जांच हो तो ज्यादातर मामलों में विपक्षियों को लाभ पहुंचाया जाता है उदाहरण सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सत्येंद्र प्रकाश तिवारी द्वारा की गई पोस्ट में आरोप लगाया गया है कि शिकायतों का निस्तारण वास्तविकता में नहीं, बल्कि कागजों में “फर्जी आख्या” लगाकर किया जा रहा है।
मामला तहसील सदर क्षेत्र के गांव लौकिहा से जुड़ा बताया जा रहा है, जहां खलिहान की जमीन (गाटा संख्या 220/0.267 हेक्टेयर) पर लंबे समय से कब्जा होने की शिकायत दर्ज कराई गई थी। शिकायतकर्ता का कहना है कि साधन सम्पन्न दर्जनों कब्जाधारियों के बावजूद प्रशासन अब तक जमीन को मुक्त नहीं करा सका है। इसके उलट, बिना स्थलीय जांच और प्रभावी कार्रवाई के ही रिपोर्ट लगाकर शिकायत का निस्तारण दर्शा दिया गया पोस्ट में यह भी गंभीर आरोप लगाया गया है कि राजस्व विभाग के कुछ कर्मचारी फर्जी रिपोर्ट लगाकर अपने दायित्वों से बच रहे हैं। शिकायतकर्ता ने मांग की है कि मामले में पारदर्शिता लाने के लिए संबंधित अधिकारियों द्वारा किए गए कॉल और संपर्क की कॉल डिटेल्स सार्वजनिक की जाएं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि पीड़ित से वास्तव में संपर्क किया गया है या नहीं।
इस पूरे प्रकरण को लेकर @CMOfficeUP और @DMKheri को भी टैग कर उच्च स्तरीय जांच की मांग की गई है। स्थानीय लोगों में भी इस मामले को लेकर नाराजगी देखी जा रही है और निष्पक्ष कार्रवाई की अपेक्षा की जा रही है।
हालांकि, खबर लिखे जाने तक खीरी प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यदि लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न केवल जनसुनवाई प्रणाली की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करेगा, बल्कि आम जनता के भरोसे को भी कमजोर करेगा।

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