गुजरात में मुस्लिम मछुआरों ने सामूहिक इच्छामृत्यु की मांग के लिए हाईकोर्ट में दी याचिका
राष्ट्रीय May 25, 2022 at 12:29 PM , 350अहमदाबाद | गुजरात के गोसबारा गांव में मुसलमानों ने सामूहिक इच्छामृत्यु की अनुमति के लिए हाईकोर्ट में एक याचिका लगाई है. इच्छामृत्यु की मांग करने वाले मछुआरों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए जमाअत इस्लामी हिंद के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने गुजरात के पोरबंदर में स्थित गांव गोसाबारा का दौरा किया.
गौरतलब है कि 5 मई 2022 को गुजरात हाईकोर्ट में सामूहिक इच्छामृत्यु की मांग के लिए कुछ मुस्लिम मछुआरों द्वारा एक याचिका दायर की गई थी.
इस प्रतिनिधिमंडल में सचिव इकबाल मिर्ज़ा, वेलफेयर पार्टी के इकराम बेग और जूनागढ़ इकाई के अध्यक्ष अल्ताफ शेख शामिल थे. राजकोट के प्रतिनिधिमंडल में राजकोट के पूर्व विधायक और दलित नेता सिद्धार्थ परमार और उनकी टीम भी शामिल थी.
प्रतिनिधिमंडल 17 मई 2022 को सुबह राजकोट से पोरबंदर के लिए रवाना हुआ था. अल्लाहराखां भाई थिम्मर उर्फ लाखा भाई के नेतृत्व में गोसबारा गांव के मुस्लिम मछुआरों के एक समूह ने पोरबंदर के जिला न्यायालय परिसर में प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया और एक युवा और अनुभवी वकील इकबाल भाई सालोत के चेम्बर में एक मीटिंग की गई.
एक युवा, बुद्धिमान और साहसी व्यक्ति लाखा भाई ने प्रतिनिधिमंडल को मछुआरों की पूरी कहानी सुनाई.
पोरबंदर से करीब 10 किलोमीटर दूर गोसबारा गांव में 200 लोगों के साथ मुस्लिम मछुआरों के करीब 100 परिवार रहते हैं. आरोप है कि इन लोगों को सरकार पिछले दस सालों से परेशान कर रही है. उन्हें मछली पकड़ने के लिए समुद्र में जाने की अनुमति नहीं दी जा रही है, जो कि उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है. उन्हें कई बहाने से रोका जा रहा है.
दूसरी ओर, यदि वे अपनी नाव लेते हैं, तो उन्हें खारवा जाति से संघर्ष का सामना करना पड़ता है. और यही कारण है कि पुरुषों को अपनी आजीविका के लिए नदी और झीलों में मछली पकड़ने के लिए अन्य छोटे श्रम कार्य करने के लिए मजबूर किया जाता है, और इसके लिए उन्हें कभी-कभी महीनों तक अपने गांव से दूर रहना पड़ता है. इससे उनकी महिलाओं और बच्चों को अकेले रहने के कारण खतरा बना रहता है.
ऐसी परिस्थितियों में भी सरकार की ओर से कोई सुनवाई नहीं होने के कारण परेशान होकर, उन्हें सामूहिक इच्छामृत्यु की मांग करने के लिए मजबूर होना पड़ा. लाखा भाई ने यह जानकारी विस्तार से दी और सभी दस्तावेज़ और पत्राचार दिखाया. चौंकाने वाली बात यह रही कि मत्स्य पालन के सहायक निदेशक ने भी जो सरकारी जवाब दिया है वो भी भेदभाव को दर्शाने वाला था.
उनके इस जवाब में लिखा है कि एक भाजपा नेता और मछुआरों का एक समूह चाहता है कि इन लोगों को मछली पकड़ने की अनुमति न दी जाए और उन बीजेपी समर्थक मछुआरों के प्रतिनिधित्व के कारण इन मुस्लिम मछुआरों को मछली पकड़ने के लिए समुद्र में जाने की अनुमति नहीं है. बिना किसी कारण या नियम के केवल एक राजनीतिक दल के प्रतिनिधित्व के आधार पर किसी को उसकी आजीविका से वंचित करना कितना सही है इसे आसानी से समझा जा सकता है.
बीजेपी नेता के बयान में यह कहा गया है कि अगर इन लोगों को मछली पकड़ने के लिए समुद्र में जाने की अनुमति दी गई, तो इससे दो समूहों में संघर्ष होगा जिसके परिणामस्वरूप क्षेत्र में शांति खतरे में पड़ जाएगी, परंतु क्या यह तर्क वाकई उचित है? और पिछले दस वर्षों में कोई संघर्ष नहीं हुआ है, और अगर कोई अप्रिय स्थिति पैदा होती है तो यह कानून और व्यवस्था का मामला है.
पास के गांव के हिंदू इन मुस्लिम मछुआरों को अपना पूरा समर्थन देते हैं और उनके सेवा कार्यों की सराहना भी करते हैं.
इकबाल भाई ने पास के टुकड़ा गांव के सरपंच (ग्राम प्रधान) लाला भाई से भी टेलीफोन पर बात की, जो एक ब्राह्मण हैं. सरपंच इन मछली पकड़ने वाले परिवारों की सामाजिक कार्यों से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने पूर्ण सहयोग का वादा भी किया.
दरअसल आज से करीब 18 साल पहले इस क्षेत्र में आरडीएक्स (एक विस्फोटक पदार्थ) के उतरने का एक मामला सामना आया था. आरडीएक्स को एक अज्ञात नाव से लाया गया था. तब गिरफ्तार किए गए सभी लोगों को अब बरी कर दिया गया है. लेकिन अधिकारी अभी भी इस घटना के कारण इस क्षेत्र को संवेदनशील मानते हैं इसलिए आज भी यहां के मछुआरों का सरकारी उत्पीड़न हो रहा है.
प्रतिनिधिमंडल ने गोसबारा गांव का भी दौरा किया. ग्रामीणों ने प्रतिनिधिमंडल का खुशी-खुशी स्वागत किया और उन्हें मछली का स्वादिष्ट भोजन भी परोसा गया.
इस गांव में कोई मस्जिद, स्कूल या अस्पताल नहीं है. गाँव में कई बुद्धिमान और उत्साही बच्चे हैं, जिनमें से अगले गाँव में केवल 15-20% बच्चे ही स्कूल जाते हैं. अधिकांश समय पुरुष काम के लिए बाहर जाते हैं और बच्चों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता है. लोगों के पास पांच से छह बड़ी मछली पकड़ने वाली नावें हैं लेकिन अनुमति के अभाव में ये नावें भी अनुपयोगी हो गई हैं.
प्रतिनिधिमंडल ने वहां जुहर (दोपहर) और असर (शाम) की नमाज़ अदा की. सचिव इकबाल भाई ने सारी जानकारी ली और उन्हें आवश्यक निर्देश दिए.
उन्होंने अपने मामले का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल को आयुक्त और सचिव के पास भेजने का आश्वासन दिया और इस बीच कानूनी लड़ाई भी जारी रहेगी. स्थानीय समस्या के समाधान के लिए तत्काल एक टीम भेजी जाएगी. शाम को प्रतिनिधिमंडल राजकोट लौट आया.
जमात प्रतिनिधिमंडल को यह दौरा इसलिए करना पड़ा क्योंकि मुस्लिम समुदाय के सैकड़ो मछुआरे इच्छामृत्यु के लिए भारतीय अदालत की मंज़ूरी की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि प्रशासनिक भेदभाव ने उन्हें आजीविका कमाने में असमर्थ बना दिया है. गोसबारा के मुस्लिम मछुआरों को अपनी आजीविका कमाने से रोक दिया गया है और अब उन्होंने अदालत से मरने का अधिकार मांगा है.
5 मई (2022) को गुजरात उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें पोरबंदर के गोसाबारा आर्द्रभूमि के 100 मुस्लिम मछुआरा परिवारों का प्रतिनिधित्व करने वाले अल्लाहरखा इस्लामिलभाई थिम्मर द्वारा “600 लोगों के लिए इच्छामृत्यु” की मांग की गई थी.
उन्होंने इच्छामृत्यु के लिए अपने और अपने समुदाय के 600 सदस्यों के लिए अनुमति की मांग करते हुए याचिका दायर की. थिम्मर पोरबंदर के गोसाबारा आर्द्रभूमि से ताल्लुक रखते हैं और उन्होंने “मछुआरे समुदाय की बिगड़ती आर्थिक स्थिति पर शोक व्यक्त करते हुए” याचिका दायर की.
आवेदन गोसबारा मुस्लिम फिशरमेन सोसाइटी की ओर से दायर किया गया, और आरोप लगाया गया है कि “सरकार एक विशेष समुदाय के लोगों को सुविधाएं नहीं देती है.”
मछुआरों के समुदाय ने कहा है कि वे “राजनीतिक उत्पीड़न” का सामना कर रहे हैं, इसलिए “अपने जीवन को समाप्त करने के लिए अनुमति मांग रहे हैं, स्थानीय स्तर से लेकर राज्यपाल तक को कई पत्र लिखे गए लेकिन सब लंबित हैं.
2016 के बाद से गोसबारा का मुस्लिम समुदाय मछली पकड़ने वाला एकमात्र समुदाय है, जिसे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य पोरबंदर, गुजरात में मछली पकड़ने वाली नौकाओं को रखने की अनुमति नहीं है. स्थानीय जिला मजिस्ट्रेट के अनुसार, यह मुद्दा “तकनीकी है, धर्म से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है” और इसे मत्स्य विभाग द्वारा ही देखा जाएगा.
पिछले 100 वर्षों से पश्चिमी राज्य गुजरात के पोरबंदर जिले में रह रहे 600 सदस्यीय समुदाय ने पिछले सप्ताह इच्छामृत्यु याचिका दायर की थी. उनका गांव, गोसाबारा, इस क्षेत्र में एकमात्र मुस्लिम-बहुल बस्ती है और उनका कहना है कि 2016 के बाद से इस क्षेत्र में मछली पकड़ने वाली नौकाओं को रखने की अनुमति नहीं दी गई है.
इच्छामृत्यु और आत्महत्या के प्रयास भारतीय दंड संहिता के तहत अवैध हैं. इस्लाम धर्म में खुदकुशी की सख्त मनाही है.
मछुआरों का कहना है कि वे ज़िंदा नहीं रह पाएंगे यदि वे उस राज्य में रहने में असमर्थ हैं जो भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का घर है और उनकी हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी का गढ़ है.
गोसाबारा मुस्लिम फिशरमेन सोसाइटी के अध्यक्ष अल्लाहरखा इस्माइल भाई थिमर को अरब न्यूज़ ने उल्लेख करते हुए लिखा कि “2016 से, हम भेदभाव का सामना कर रहे हैं. उन्होंने हमें गांव खाली करने और एक अलग जिले में जाने के लिए कहा.”
हमारे पास नावों और मछली पकड़ने का लाइसेंस है. हमने ज़िला मजिस्ट्रेट, राज्य के मुख्यमंत्री और अन्य अधिकारियों के समक्ष एप्लीकेशन दिया है लेकिन किसी ने हमारे पात्र का जवाब नहीं दिया, इसलिए हताशा में, हमने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर इच्छामृत्यु के अधिकार की मांग की, क्योंकि हम इस तरह नहीं रह सकते.”
थिम्मर सवाल करते हुए कहा कि गोसाबारा के पड़ोसी हिंदू समुदायों के पास भी हमारे जैसे ही मछली पकड़ने का लाइसेंस है, लेकिन उनके विपरीत, उन्हें अपनी नावों को रखने की अनुमति है. “हमें समान अधिकार और सुविधाएं क्यों नहीं मिलनी चाहिए?”
जबकि गुजरात उच्च न्यायालय के जून के पहले सप्ताह में मामले को उठाने की उम्मीद है, पोरबंदर के अधिकारियों का कहना है कि यह मुद्दा एक तकनीकी है, जिसका धर्म से कोई संबंध नहीं है.
जिला मजिस्ट्रेट एएम शर्मा को अरब समाचार में उल्लेख करते हुए लिखा गया है कि, “कारण तकनीकी या कानूनी हो सकता है. धर्म निश्चित रूप से इसका कारण नहीं है.”
उन्होंने कहा, “कोई बड़ा मुद्दा नहीं है जिसके लिए लोगों को अपनी जान लेने का विचार करना चाहिए और उस तरह का आवेदन अदालत में देना चाहिए. उन्होंने कहा कि हम पीड़ित लोगों का समर्थन करेंगे, मत्स्य पालन विभाग इस मुद्दे का समाधान करेगा.”
गुजरात के सबसे बड़े शहर अहमदाबाद के एक वकील धर्मेश गुर्जर, जिन्होंने मछुआरों की ओर से अदालत में याचिका दायर की, ने कहा कि यह मामला “राज्य तंत्र की विफलता” को दर्शाता है. उन्होंने कहा, “मुस्लिम मछुआरों की दुर्दशा से मैं बहुत बुरी तरह प्रभावित हुआ हूं. ये लोग अनपढ़ और बहुत गरीब हैं और उनके पास उच्च न्यायालय तक पहुंचने का साधन नहीं है.”
उन्होंने कहा कि मछुआरों को 2016 से पहले गांव में अपनी नावों को रखने की अनुमति थी, लेकिन उसके बाद से अनुमति से इनकार कर दिया गया. जब उन्होंने 8 किमी दूर दूसरे गांव में रखने की अनुमति मांगी, तो भी मंजूरी नहीं दी गई.
गुर्जर ने कहा “इस सबका असर ये हुआ है कि, मछुआरे पीड़ित हैं, उनकी आय समाप्त हो गई है. फिर वे कैसे जीवित रह सकते हैं? इसलिए उन्होंने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. “वे कहते हैं कि वे मृत लकड़ी की तरह हैं, और एक अच्छी आजीविका के बिना, जीवन को सामूहिक रूप से समाप्त करना बेहतर है इसलिए उन्होंने सामूहिक इच्छामृत्यु की मांग की है.”
उन्होंने कहा कि, “उन्हें परेशान किया जाता है और उनके साथ भेदभाव किया जाता है इसीलिए मुस्लिम मछुआरों ने सामूहिक इच्छामृत्यु की गुहार लगाई है.” मछुआरों का कहना है कि वे “राजनीतिक उत्पीड़न” का सामना कर रहे हैं और “अपना जीवन समाप्त करने” की अनुमति चाहते हैं.”
एडवोकेट धर्मेश गुर्जर ने मीडिया को बताया कि गोसाबारा बंदरगाह पर 2016 से नौकाओं के लंगर पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. “थिम्मर और उनके समुदाय को लाइसेंस होने के बावजूद उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है.”
थिम्मर ने यह भी आरोप लगाया है कि अधिकारी धर्म के आधार पर उनके परिवारों को ‘परेशान’ कर रहे हैं. उन्होंने आरोप लगाया है कि “हिंदू मछुआरों को नियमित रूप से सभी सुविधाएं दी जाती हैं.”
याचिका में कहा गया है कि मुस्लिम समुदाय हमेशा “राष्ट्र के प्रति वफादार” रहा है और कभी भी तस्करी जैसी “राष्ट्र विरोधी गतिविधियों” में शामिल नहीं रहा है. उनके समुदाय ने वास्तव में हमेशा “पाकिस्तान और अन्य द्वारा प्रायोजित” ऐसी गतिविधियों पर “सुरक्षा एजेंसियों को जानकारी दी” है.
थिम्मर ने इसके लिए राज्यपाल, मुख्यमंत्री और पोरबंदर कलेक्टर को भी ज्ञापन भेजा है. थिम्मर को गुजरात उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि गुजरात सरकार को बार-बार आवेदन देने के बाद भी आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गई.






























Comments