पितृपक्ष : जब आँखें तर्पण करने लगती हैं

जनपत की खबर , 64

लेखक : राकेश पाण्डेय “निश्छल”

पितृपक्ष आते ही उन बरगदों की बड़ी याद आती है, जिनकी छाँव कभी जीवन का पहला सुख हुआ करती थी। वे बरगद, जिनकी जड़ों में हमारी स्मृतियाँ थीं, जिनकी शाखाओं पर हमारा बचपन झूला करता था और जिनकी छाँव में बैठकर हम जीवन का अर्थ जाने-अनजाने सीखते रहे।

हाथ में कुश, तिल, अक्षत और जल उठाते ही आँखों के सामने जैसे किसी पुराने बाइस्कोप की रील घूमने लगती है—ये बाबा हैं... ये पापा... ये काका... ये चाचा... ये बड़े बाबूजी...

एक-एक चेहरा अचानक सामने आ जाता है। लगता है जैसे स्मृतियों का कोई पुराना पिटारा खुल गया हो और उसमें रखी अपनी सबसे पसंदीदा चीजें एक-एक करके दिखाई देने लगी हों। मन उन्हें छू लेना चाहता है, आवाज देना चाहता है, उनके पास जाकर बैठना चाहता है... लेकिन समय की सबसे कठोर सच्चाई सामने खड़ी रहती है—अब उन्हें छू नहीं सकते।

बस एक झलक देखनी है और उसी झलक से मन को संतोष देना है।

पिता की स्मृतियों में कई रंग होते हैं। कभी वे थोड़े नाराज दिखाई देते हैं, कभी उदास, कभी डाँटते हुए, कभी किसी गलती पर आँखें तरेरते हुए और कभी अचानक उसी कठोर चेहरे के पीछे से मुस्कान झरने लगती है। पिता का प्रेम अक्सर अनुशासन की भाषा बोलता है। उनकी डाँट में भी भविष्य की चिंता छिपी होती है और उनकी चुप्पी में भी अनगिनत शब्द।

लेकिन पितामह की स्मृतियाँ कुछ और होती हैं।

उनकी आँखों में जैसे डाँट के लिए जगह ही नहीं थी। वहाँ केवल प्रेम था, दुलार था और आशीर्वाद था। शायद इसीलिए भारतीय परिवारों में ‘बाबा’ केवल एक संबोधन नहीं, प्रेम का दूसरा नाम हैं।

और फिर मन एक विचित्र गणित करने लगता है।

अगर बाबा से पहले के पूर्वजों को याद करें, तो लगता है कि वहाँ शायद कोई शिकायत बची ही नहीं होगी। पिता की पीढ़ी तक आते-आते जीवन के संघर्ष, अपेक्षाएँ और अनुशासन रहे होंगे; लेकिन उससे पीछे जाएँ तो जैसे केवल आशीर्वाद ही बचता जाता है। जितना पीछे जाइए, उतना ही प्रेम शुद्ध होता जाता है।

शायद पूर्वजों की परंपरा भी ऐसी ही होती है—पीढ़ियाँ पीछे जाती हैं और शिकायतें छूटती जाती हैं, केवल आशीर्वाद रह जाता है।

धर्म की उँगली थामकर जब पीछे निहारता हूँ तो यह यात्रा किसी एक परिवार की सीमा में नहीं रुकती। महर्षि शाण्डिल्य और कश्यप जैसे ऋषियों की स्मृति से होती हुई कल्पना के तार उस क्षीरसागर तक चले जाते हैं, जहाँ भगवान श्रीहरि की नाभि से निकले कमल पर ब्रह्मदेव विराजमान हैं।

वह कमल आखिर कौन है?

शायद वह इस सृष्टि का पहला अंकुर है। इस धरती पर हर दिन फूटते करोड़ों अंकुरों, जन्म लेते असंख्य जीवों और खिलते अनगिनत पुष्पों में कहीं न कहीं उसी प्रथम कमल का बीज है।

और तब अचानक समझ आता है कि एक व्यवस्थित सभ्यता, एक परंपरा और एक वंश का हिस्सा होते ही मनुष्य कितना विराट हो जाता है।

हम केवल ‘मैं’ नहीं रहते।

हमारे भीतर हमारे पिता होते हैं, उनके भीतर हमारे बाबा, उनके भीतर उनके पिता और फिर उनसे भी पीछे जाने पर एक ऐसी अनंत श्रृंखला, जिसका अंतिम सिरा हमारी कल्पना से भी बहुत दूर चला जाता है।

हम अपने भीतर कई पीढ़ियों का जीवन लेकर चलते हैं।

इसीलिए पितृपक्ष केवल कर्मकांड नहीं है। यह स्वयं को अपनी जड़ों से जोड़ने का अवसर भी है।

चार दिन पहले पड़ोस के एक चाचा गया जी जा रहे थे। ग्रामीण परंपरा के अनुसार गाँव भर के लोग उन्हें गाजे-बाजे के साथ पूरे गाँव का चक्कर लगाते हुए विदा करने निकले। मैं भी वहीं था।

मैंने देखा—वे बार-बार अपने गमछे से अपनी आँखों के आँसू छिपा रहे थे।

मन ने सहज ही प्रश्न किया—एक उत्तम और पुण्य कार्य के लिए जाते हुए कोई रोता है क्या?

लेकिन कुछ प्रश्नों के उत्तर शब्दों से नहीं, उम्र से मिलते हैं।

शायद उन्हें अपने पीछे छूटता हुआ पूरा जीवन दिखाई दे रहा था। शायद उन्हें वे चेहरे याद आ रहे थे, जिन्हें उन्होंने वर्षों पहले विदा किया था। शायद पिता का चेहरा, बाबा की आवाज, घर के आँगन की कोई दोपहर, किसी त्योहार की सुबह, किसी पुराने कमरे की गंध—सब एक साथ उनकी स्मृति में लौट आए होंगे।

और जब स्मृतियाँ एक साथ लौटती हैं तो आँखें केवल आँसू नहीं बहातीं...

आँखें तर्पण करने लगती हैं।

गया जाने वाला वह वृद्ध अकेला नहीं जा रहा था। उसके साथ उसके पिता जा रहे थे, उसके बाबा जा रहे थे, उसके पुरखे जा रहे थे। उसके हाथ में केवल तिल, कुश और जल नहीं था—उसके हाथ में कई पीढ़ियों की स्मृतियाँ थीं।

पितृपक्ष में हरिद्वार, काशी और गया की ओर जाती श्रद्धा को देखिए तो लगता है जैसे पूरा समाज अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है।

कोई अपने पिता को याद कर रहा है, कोई माँ को, कोई बाबा को, कोई उस दादा को जिसकी उँगली पकड़कर उसने चलना सीखा था। किसी के पास तस्वीर है, किसी के पास केवल धुँधली स्मृति। किसी को आवाज याद है, किसी को हाथ का स्पर्श। किसी को केवल इतना याद है कि बचपन में एक बुजुर्ग हथेली उसके सिर पर रख दी जाती थी और मन को अजीब-सी सुरक्षा मिल जाती थी।

हम अपने पितरों को कहाँ देखना चाहते हैं?

शायद उसी लोक में जहाँ दूध-दही की नदियाँ बहती हों, जहाँ हवा में हवन की सुगंध हो, जहाँ शुक और पिक भी वेदों के मंत्र गाते हों, जहाँ घृणा न हो, द्वेष न हो, क्रोध न हो। जहाँ पहुँचकर मनुष्य देवत्व को प्राप्त कर ले।

हमारी कल्पना उन्हें उसी उजले लोक में देखना चाहती है।

जहाँ वे स्वस्थ हों।
जहाँ वे प्रसन्न हों।
जहाँ उन्हें किसी चीज की आवश्यकता न हो।
जहाँ जीवन का कोई अधूरापन न बचा हो।

और शायद हमारी सबसे गहरी प्रार्थना यही होती है—

हे देव! हमारे पितरों को वापस मत भेजना।
उन्हें वहीं रहने देना।
तृप्त रहने देना।
प्रसन्न रहने देना।
देवता बने रहने देना।

क्योंकि हमने उन्हें जीवन में बहुत थोड़ा समझा था।

जब पिता थे, तब उनकी डाँट बड़ी लगती थी। जब बाबा थे, तब उनका दुलार सहज लगता था। जब वे चले गए, तब समझ आया कि घर में उनकी उपस्थिति कितनी बड़ी चीज थी।

कुछ लोग घर में रहते हुए घर की तरह होते हैं।

उनके चले जाने के बाद पता चलता है कि घर केवल ईंट, दीवार और छत नहीं था। घर तो उनकी आवाज थी, उनकी खाँसी थी, उनकी चारपाई थी, उनका इंतजार था, उनका आशीर्वाद था।

पितृपक्ष हमें इसी अनुपस्थिति की उपस्थिति का एहसास कराता है।

हम जल चढ़ाते हैं, लेकिन वास्तव में अपनी स्मृतियों को सींचते हैं।

हम तिल अर्पित करते हैं, लेकिन वास्तव में अपने भीतर बची हुई कृतज्ञता को अर्पित करते हैं।

हम कुश रखते हैं, लेकिन वास्तव में अपनी जड़ों को थामते हैं।

और जब हाथ से जल की अंतिम धार गिरती है, तब लगता है जैसे समय की नदी में कहीं बहुत दूर बैठे हमारे अपने लोग उसे स्वीकार कर रहे हैं।

शायद तर्पण का अर्थ केवल यह नहीं कि हम उन्हें जल दे रहे हैं।

तर्पण का एक अर्थ यह भी है कि हम स्वीकार कर रहे हैं—हम जो कुछ हैं, उसमें हमारा बहुत कुछ हमारा अपना नहीं है।

हमारी आँखों का रंग, हमारे चेहरे की बनावट, हमारी भाषा, हमारी आदतें, हमारे संस्कार, हमारी स्मृतियाँ—कितना कुछ उन लोगों का दिया हुआ है जिन्हें हम आज देख नहीं सकते।

हमारी पीठ पर जो हाथ आज नहीं है, उसका आशीर्वाद फिर भी हमारे साथ चलता है।

इसीलिए पितृपक्ष मृत्यु का उत्सव नहीं, स्मृति और कृतज्ञता का पर्व है।

यह हमें बताता है कि मनुष्य की उम्र सीमित हो सकती है, लेकिन उसके संस्कारों की उम्र बहुत लंबी होती है।

एक पिता चला जाता है, पर उसकी कही हुई कोई बात बेटे की पूरी जिंदगी में जीवित रहती है।

एक बाबा चले जाते हैं, पर उनका दिया हुआ आशीर्वाद आने वाली पीढ़ियों के माथे पर बना रहता है।

एक पुरखा चला जाता है, लेकिन उसकी बोई हुई संस्कृति किसी बच्चे की पहली प्रार्थना में फिर जन्म ले लेती है।

शायद इसी का नाम वंश है।

इसी का नाम परंपरा है।

इसी का नाम पितृऋण है।

और शायद इसी का नाम जीवन भी है—पीछे मुड़कर अपनी जड़ों को प्रणाम करना और आगे बढ़ते हुए अगली पीढ़ी के लिए वही छाँव छोड़ जाना, जिसकी याद पितृपक्ष में हमें बरगदों की तरह आती है।

आज फिर जब हाथ में कुश, तिल, अक्षत और जल उठाऊँगा, तो आँखों के सामने वही बाइस्कोप चलेगा—

बाबा मुस्कुरा रहे होंगे...

पिता शायद थोड़े नाराज होंगे...

कोई काका आवाज दे रहा होगा...

बड़े बाबूजी दूर खड़े आशीर्वाद दे रहे होंगे...

और मैं दूर खड़ा होकर केवल इतना कह पाऊँगा—

आप जहाँ भी हैं, तृप्त रहिए।
प्रसन्न रहिए।
हमारे हिस्से का आशीर्वाद देते रहिए।
हम आपको भूल नहीं पाए हैं...
और शायद कभी भूल भी नहीं पाएँगे।

क्योंकि कुछ रिश्ते मृत्यु के बाद समाप्त नहीं होते।

वे बस दिखाई देना बंद हो जाते हैं।

और फिर पितृपक्ष में, जब आँखें यूँ ही तर्पण करने लगती हैं, हम जान जाते हैं—वे कहीं गए नहीं हैं।
वे हमारी स्मृतियों, हमारे संस्कारों और हमारे रक्त में अब भी जीवित हैं।

— राकेश पाण्डेय “निश्छल”

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