दोस्ती या संवेदनशीलता का अभाव?

हेडलाइंस , 169

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष की लपटें अब भारत की दहलीज तक आ पहुँची हैं। भारतीय जलसीमा के निकट ईरानी जहाज 'इरिस देना' को अमेरिकी सेना द्वारा डुबोया जाना केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि भारत की सामरिक संप्रभुता और अतिथि-सत्कार की परंपरा पर एक गंभीर प्रहार है। यह घटना इसलिए अधिक चिंताजनक है क्योंकि यह जहाज किसी युद्धक मिशन पर नहीं, बल्कि भारत के प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय बेड़ा समीक्षा कार्यक्रम 'मिलन' में शामिल होकर वापस लौट रहा था।

अमेरिकी युद्ध मंत्री पीटर हेगसेट का इस हमले को 'बड़ी सफलता' बताना यह स्पष्ट करता है कि यह कोई मानवीय चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित आक्रामक संदेश है। विडंबना यह है कि जिस जहाज को भारत ने अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था, उसे भारतीय तटों के पास ही निशाना बनाया गया। यह अमेरिका के उस अहंकार को दर्शाता है जहाँ वह अपने युद्ध के मैदान को परिभाषित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और मेजबान देश की गरिमा की परवाह करना जरूरी नहीं समझता।

मर्यादाओं का उल्लंघन और भारत की स्थिति
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का यह तर्क कि जहाज 'सुरक्षित मोड' में था और उस पर गैर-लड़ाकू कर्मचारी सवार थे, हमले की क्रूरता को और बढ़ा देता है। अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुसार, मित्र राष्ट्रों के जलक्षेत्र में ऐसे जहाजों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित होना चाहिए। ट्रंप प्रशासन का यह कदम न केवल अंतरराष्ट्रीय मर्यादाओं को ताक पर रखता है, बल्कि भारत के प्रति उसकी संवेदनशीलता पर भी बड़े सवाल खड़े करता है।

भारत के लिए अब यह केवल सिद्धांत का मामला नहीं रह गया है। दुनिया में महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर देश के लिए अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करना पहली शर्त है। पूर्व में वेनेजुएला और ईरान के मुद्दों पर मौन रहकर भारत शायद वैश्विक संतुलन साधने की कोशिश कर रहा था, लेकिन अब आग खुद के घर के करीब है।

समय है मुखर होने का
भारत को इस मामले में केवल चिंता व्यक्त करने के बजाय औपचारिक विरोध और कड़ी आपत्ति दर्ज करानी चाहिए। यदि आज हम अपने 'अतिथि' की सुरक्षा और अपनी सीमा के पास होने वाली हिंसा पर चुप रहते हैं, तो भविष्य में इसके आर्थिक और सामरिक परिणाम और भी गंभीर होंगे। अमेरिकी युद्ध की आंच को भारतीय तटों तक पहुँचने देना हमारी कूटनीतिक विफलता मानी जाएगी।

नई दिल्ली को वाशिंगटन को यह स्पष्ट संदेश देना होगा कि भारत का समुद्र शांति का क्षेत्र है, किसी दूसरे के निजी युद्ध का अखाड़ा नहीं। अपनी अंतरराष्ट्रीय हैसियत और प्रतिष्ठा को बचाए रखने के लिए भारत को अब बोलना ही होगा।

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