शिशु वाटिका में हर्षोल्लास के साथ मनाई गई स्वामी विवेकानंद जयंती

लखीमपुर खीरी , 123

लखीमपुर खीरी।विद्या भारती विद्यालय सनातन धर्म सरस्वती शिशु वाटिका लखीमपुर खीरी में आज राष्ट्रीय युवा दिवस के उपलक्ष्य के अवसर पर वन्दना सभा में विद्यालय की संचालिका श्रीमती हीरा सिंह ने स्वामी विवेकानंद जी पर माल्यार्पण कर अपने विचार रखते हुए बताया कि विश्व में भारतीय संस्कृति को स्थापित करने वाले महान आध्यात्मिक गुरु, समाज सुधारक और युवाओं के प्रेरणा स्रोत स्वामी विवेकानंद जी की को कोटि कोटि नमन करते हुए कहा कि आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत:बचपन से ही ईश्वर को जानने की ललक ने उन्हें श्रीरामकृष्ण परमहंस के पास पहुँचाया, जिन्होंने उनके आध्यात्मिक मार्ग को प्रशस्त किया और उन्हें 'विवेकानंद' नाम दिया।कार्यक्रम की संयोजिका बहन ऋचा बाजपेई जी ने जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 
स्वामी विवेकानंद जयंती हर साल 12 जनवरी को मनाई जाती है, जो एक महान भारतीय दार्शनिक, लेखक और वक्ता थे। उनका जन्म 12 जनवरी, 1863 को कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ था। उन्होंने विश्व को भारतीय संस्कृति और वेदांत दर्शन से परिचित कराया और युवाओं को आत्म-विश्वास और सेवा भाव से प्रेरित किया स्वामी विवेकानंद के विचार और शिक्षाएं आत्म-विश्वास उन्होंने युवाओं को अपने भीतर की शक्ति को पहचानने और आत्म-विश्वास के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने सेवा को पूजा माना और लोगों की सेवा करने के लिए प्रेरित किया।उन्होंने वेदांत दर्शन को विश्वभर में प्रसारित किया और इसके महत्व को समझाया। उन्होंने शिक्षा के महत्व पर बल दिया और युवाओं को शिक्षित करने के लिए प्रेरित किया।स्वामी विवेकानंद जयंती हमें उनके आदर्शों और शिक्षाओं को याद करने और अपने जीवन में लागू करने के लिए प्रेरित करती है। यह दिन युवाओं को आत्म-विश्वास, सेवा भाव और शिक्षा के महत्व को समझने के लिए प्रेरित करता है । विद्यालय की शिक्षिका बहन सु श्री अंशिका जी ने तर्क और साहस का उदाहरण देते हुए कहा कि एक बार नरेंद्र नाथ अपने दोस्तों के साथ एक चंपा के पेड़ पर खेल रहे थे, तभी एक बुजुर्ग ने उन्हें भूत का डर दिखाकर वहाँ से हटा दिया, जो रात में गर्दन मरोड़ देता है। नरेंद्र ने दोस्तों से कहा कि यह डर अच्छी बात नहीं, और वे अकेले ही पेड़ पर चढ़ने लगे। जब दोस्तों ने भूत का डर दिखाया, तो नरेंद्र हँसकर बोले, "अगर सचमुच भूत होता, तो अब तक मेरी गर्दन मरोड़ चुका होता।" इससे पता चलता है कि वे अंधविश्वास से दूर, तर्क और साहस पर विश्वास करते थे। समस्त शिक्षिकाऐं बहने उपस्थित रही।

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