कथा में दसवें दिन सुनाया गया सुदामा प्रसंग

लखीमपुर खीरी , 89

धौरहरा खीरी। कस्बे में संत फकीर दास स्मारक मठ पर आयोजित कार्यक्रम में चल रही दस दिवसीय धार्मिक कथा के समापन के दिन में ब्याकरणाचार्य गरुणध्वज बाजपेई ने सुदामा चरित्र का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि गरीब ब्राह्मण सुदामा बाल्यावस्था में शिक्षा ग्रहण करने के लिए गुरु संदीपन के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने जाते है उनके साथ कृष्ण के भाई बलराम भी जाते हैं।आश्रम के लिए लकड़ी लाने के लिए सुदामा व कृष्ण एक साथ जाते हैं गुरु माता द्वारा दोनों बालकों को भुनें चने दे दिए और कहा कि भूख लगने पर दोनों लोगो को खाने की बात कही।जगंल में लकड़ी बीनने के दौरान सुदामा के पैर में कांटा चुभ गया तो उस कांटे को कृष्ण ने निकाल दिया।तभी जंगल में घनघोर वर्षा शुरू हो गई काफी देर तक वर्षा होने के चलते सुदामा को भूख लगने से चोरी छिपे आधे खा लिए।कृष्ण को यह अनुमान हो गया कि सुदामा ने चोरी से चने खा लिए।इस बात की जानकारी करने पर सुदामा ने साफ इंकार कर दिया तब कृष्ण ने सुदामा को श्राप दे दिया कि तुमने हमसे छिपकर चोरी से चने खाएं है तुम आजीवन दाने दाने को मोहताज रहोगे। बाद में भगवान श्रीकृष्ण जी द्वारिका की राजगद्दी मिलने के द्वारिकाधीश बने।उधर सुदामा भीख मांग कर अपने परिवार का पालन-पोषण करके कृष्ण की भक्ति में लीन थे।थक हार कर पत्नी के लाख समझाने पर थक हार कर  सुदामा अपने मित्र कृष्ण से मिलने द्वारिका पुरी गये तो भगवान कृष्ण जी सुदामा की दशा देखकर रोए। पत्नी सुशीला के द्वारा मांगकर ले गए कच्चे चावलों को दयानिधान श्री कृष्ण दो बार खाकर अपने भक्त मित्र पर कृपा कर उनकी दशा सुधारी।

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