“समाज के दोष - दुर्गुण - बुराई - विकृति मिटाना केवल प्राचीन भारतीय विद्यातत्त्वम पद्धति से संभव : महात्मा दशरथ दास जी
लखीमपुर खीरी Sep 15, 2025 at 06:43 PM , 631हाथीगवां लखीमपुर। स्वामी सदानन्द जी परमहंस द्वारा संस्थापित संस्था सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के तत्त्वावधान में हाथीगवां, कुंडा, प्रतापगढ़ में चल रहे सत्संग कार्यक्रम के दूसरे दिन बोलते हुए महात्मा दशरथ दास ने कहा वर्तमान में समाज में जितना भी दोष दुर्गुण, बुराई विकृति आदि व्याप्त है उसका प्रमुख कारण है वर्तमान शिक्षा पद्धति, क्योंकि वर्तमान शिक्षा पद्धति को पूर्ण रूप से व्यावसायिक कर दिया गया है एवं प्राचीन भारतीय विद्या पद्धति अर्थात भारतीय गुरुकुल विद्या पद्धति को समाप्त कर दिया गया है । वर्तमान शिक्षा पद्धति का प्रमुख उद्वेश्य अधिकाधिक धन उपार्जन करना मात्र रह गया है जिसके कारण शिक्षार्थी चोर बेईमान पथ भ्रष्ट हो रहे हैं जिसके कारण समाज में चारों ओर बुराई, विकृति, हत्या, हिंसा, चोरी, डकैती, लुट, खसोट, बलात्कार, भ्रष्टाचार आदि व्याप्त है । जबकि प्राचीन विद्या पद्धति का सूत्र था "सा विद्या या विमुक्तय" अर्थात विद्या वही है जो मुक्ति देने वाली हो । तब विद्यार्थीयों को पढ़ाया जाता था - "सत्यम वद - धर्मम चर"
लेकिन अब शिक्षा अंतर्गत शिक्षार्थियों को केवल जड़ विषय एवं संसार और शरीर की जानकारी देकर जड़ी एवं मुढ़ी बनाया जा रहा है जबकि प्राचीन विद्या पद्धति में योग तथा अध्यात्म एवं स्वाध्याय के माध्यम से जीव एवं चेतन सत्ता शक्ति आत्मा ईश्वर ब्रह्म की जानकारी व दर्शन कराते हुए त्याग व वैराग्य से युक्त महापुरुष बनाया जाता था । स्वाध्याय के बिना कोई भी मनुष्य मनुष्य नहीं कहला सकता । अगर आज समाज में व्याप्त दोष दुर्गुण बुराई विकृति भेद भाव आदि मिटाकर अमन चैन से युक्त खुशहाल समाज का निर्माण करना है तो विद्यालयों में शिक्षा, स्वाध्याय, अध्यात्म और तत्त्वज्ञान ये चारों विधान से युक्त प्राचीन भारतीय विद्यातत्त्वम पद्धति को लागू करना ही होगा ।
उन्होंने कहा आज भी सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के अपने विद्यालयों में विद्यार्थियों को विद्यातत्त्वम पद्धति पढ़ाया जाता है । हम सरकार से निवेदन करते हैं कि देश व समाज के स्कूल कॉलेजों में सत्य की पढ़ाई अर्थात प्राचीन विद्यातत्त्वम पद्धति को पढ़ाया जाए।






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