भारत की सनातन संस्कृति और पश्चिमी दृष्टिकोण

लखीमपुर खीरी , 188

मानसिक तनाव युद्ध और भोगवाद से जूझ रहे विश्व को दिशा दिखा सकती है सनातन संस्कृति_   गुरु सत्यानंद

(केके शुक्ला/हरिशंकर मिश्र) 

लखीमपुर खीरी। भारत एक धर्मप्राण देश है। यहाँ की आत्मा "धर्म" है – वह धर्म जो किसी पंथ या संकीर्ण मत का नाम नहीं, बल्कि सार्वभौमिक और सनातन जीवन व्यवस्था का पर्याय है। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर उक्त उद्गार व्यक्त करते हुए सनातन विद्या पीठ के संस्थापक गुरु सत्यानंद जी ने कहा कि भारतवर्ष की संस्कृति “सनातन” कही गई है, जिसका अर्थ है – अनादि, शाश्वत और सार्वकालिक। यहाँ की जीवन पद्धति, संस्कार, तत्त्वचिंतन और व्यवहार सभी धर्म-संस्कृति से अनुप्राणित रहे हैं।

सनातन संस्कृति की विशेषता है कि सनातन संस्कृति किसी एक जाति, वर्ग, भाषा या सम्प्रदाय की सीमाओं में बंधी नहीं है। इसकी जड़ें वेदों, उपनिषदों, स्मृतियों, महापुराणों, महाभारत, रामायण और श्रीमद्भगवद्गीता में हैं।

यह संस्कृति "सर्वे भवन्तु सुखिनः" का उद्घोष करती है, जो किसी भी राष्ट्र की आत्मिक उन्नति का मूल आधार बन सकती है। यहाँ मनुष्य केवल एक जीव नहीं, 'अमृतस्य पुत्राः' माना गया है।

सनातन जीवन में श्रद्धा, संयम, त्याग, सात्विकता, संतुलन और परमात्मा से एकत्व का विचार न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है, बल्कि सामाजिक समरसता और वैश्विक सौहार्द की भी नींव रखता है।

जबकि पश्चिमी दृष्टिकोण और पश्चिमी विचारक व दार्शनिक जब भारत की संस्कृति से परिचित हुए, तो उन्होंने उसमें एक अत्यंत गूढ़ और अद्वितीय तत्त्व पाया। उदाहरणस्वरूप मैक्समूलर ने कहा था, "यदि मुझसे पूछा जाए कि इस धरती पर किस देश की सभ्यता सबसे प्राचीन है, तो मैं कहूँगा – भारत।"
विल ड्यूरांट ने लिखा, "भारत की सांस्कृतिक परंपरा मानव इतिहास की सबसे महान परंपराओं में से एक है।"
हेनरी डेविड थोरो और एमर्सन जैसे अमेरिकी चिंतकों ने भगवद्गीता का अध्ययन कर वैराग्य, योग और मोक्ष के रहस्य को आत्मसात करने का प्रयास किया।
जर्मन दार्शनिक शोपेनहावर ने उपनिषदों को “मानव जाति का सबसे उत्कृष्ट उपहार” कहा।
यद्यपि पश्चिमी समाज में भौतिक उन्नति को प्राथमिकता दी गई, किन्तु जैसे-जैसे वे मानसिक अशांति और सामाजिक विघटन की ओर बढ़े, उन्होंने भारत की आध्यात्मिक धरोहर की ओर आशा से देखना आरंभ किया। योग, ध्यान, आयुर्वेद, वेदांत, और कर्म सिद्धांत जैसे तत्व आज पश्चिम में अत्यंत आकर्षण और श्रद्धा के साथ अपनाए जा रहे हैं।
भारत की आत्मिक उन्नति – राष्ट्र का सच्चा उत्थान... 
किसी राष्ट्र की उन्नति केवल भौतिक संसाधनों या तकनीकी विकास से नहीं होती, अपितु उसके नागरिकों की चेतना, नैतिकता, और आत्मिक दृष्टिकोण से होती है। भारत की सनातन संस्कृति ने यही शिक्षा दी –
"धर्मो रक्षति रक्षितः",
"यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता:",
"वसुधैव कुटुम्बकम्"।

उन्होंने आगे कहा कि ऐसे आदर्श किसी मशीन या तकनीक से नहीं, संस्कारों और आचरण से प्रस्फुटित होते हैं। जब व्यक्ति स्वयं के भीतर ब्रह्म को देखता है, तब वह सभी में वही ईश्वर देखने लगता है। यही है भारतीय संस्कृति की आत्मा।
अतः आज जब विश्व मानसिक तनाव, युद्ध, भोगवाद और आत्मिक शून्यता से जूझ रहा है, तब भारत की सनातन संस्कृति एक दिव्य प्रकाश स्तंभ बनकर पुनः मानवता को दिशा दिखा सकती है।
यह आवश्यक है कि हम भारतीय अपनी ही संस्कृति पर गौरव करें, उसके तत्वों को समझें, आचरण में उतारें और संसार को यह दिखाएँ कि सच्ची उन्नति – आत्मा की उन्नति है।
भारत केवल एक भूखंड नहीं, यह तो ऋषियों की तपःभूमि, संस्कृति की जननी, और आत्मा का निवासस्थान है।
 "जय भारतवर्ष ! जय सनातन संस्कृति!"

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