पितृ श्राद्ध की आवश्यकता-गुरु सत्यानंद (क्रमशः भाग. २) सनातन विद्या पीठ
लखीमपुर खीरी Mar 03, 2025 at 07:50 PM , 106(प्रस्तुति के0के0शुक्ला)
लखीमपुर खीरी। यह तथ्य सर्वविदित है की मृत व्यक्ति अपना स्थूल शरीर तक नहीं ले जा सकता तब पाथेय (मार्ग का भोजन) कैसे ले जा सकता है? उससमय मृत व्यक्ति के सगे-सम्बन्धी श्राद्धविधि से उसके निमित्त जो कुछ देते हैं, वही उसको मिलता है। शास्त्र आज्ञा से मरणोपरान्त पिण्डदान का यही कारण है।
मृतव्यक्ति के शवयात्रा अन्तर्गत छः पिण्डदान दिए जाते हैं, भूमि के अधिष्ठातृ देवताओं की प्रसन्नता तथा भूत-पिशाचोंद्वारा होने वाली बाधाओं का निराकरण आदि प्रयोजन सिद्ध होते हैं। इसके साथ दशगात्र में दिए जाने वाले दश पिण्डों के द्वारा जीव को आतिवाहिक सूक्ष्म शरीर की प्राप्ति होती है। यह मृतव्यक्ति के महायात्रा की प्रारम्भिकबात हुई। अब आगे उसे पाथेय की आवश्यकता पड़ती है, जो उत्तमषोडशी में दिए जाने वाले पिण्डदान से उसे प्राप्त होता है। यदि सगे-सम्बन्धी पुत्र-पौत्रादि श्राद्धपिण्डदान न करें तो भूखप्यास से उसे वहां बहुत दारुण दुख होता है, साथही श्राद्ध करने से प्रमाद करने वालों को भी पग-पग पर कष्ट का सामना करना पड़ता है। मृतप्राणि बाध्यहोकर अपने श्राद्ध न करने वाले अपने सगे सम्बन्धियों का रक्त चूसने लगता है--
श्राद्धं न कुरुते मोहात् तस्य रक्तं पिबन्ति ते।
साथ ही वह श्राप भी देते हैं जो कालान्तर में पितृदोष के रुप मे सन्तति की जन्मपत्रिका में ग्रहीय पीड़ा के रूप में दृष्टिगोचर होता है।
पितरस्तस्य शापं दत्त्वा प्रयान्ति च।।
पश्चात् उस अभिशप्त परिवार को आजीवन कष्ट भोगना पड़ता है । कोई न कोई अभाव बना ही रहता है। स्पष्ट परिलक्षित होता रहता है कि जैसे किसी का श्राप हमारा पीछा कर रहा हो। संतानहीनता, असामान्य विमारी, अकारण दरिद्रता, अकाल मृत्यु का सतत दुख, प्रेतावेश का बारम्बार प्रहार आदि और अंततोगत्वा मरणोपरांत नरकगति तक -- ये सब दोष पितृ का समुचित रूप में श्राद्धकर्म नही करने से प्राप्त होता है। उपनिषद का आदेश है कि 'देवपितृकार्यभ्यां न प्रमदितव्यम्'। अर्थात् देवता तथा पितरों के कार्यों में कदापि प्रमाद नही करना चाहिए। प्रमाद से प्रत्यवाय होता है।…
पितरों को श्राद्ध की प्राप्ति का विधान..…
पितरों के निमित्त हम जो भी श्राद्धपिण्डदान तर्पण आदि करते कराते हैं, वह सब पितृ के नाम और गोत्र के सहारे विश्वेदेव एवं अग्निष्वात्त आदि दिव्य पितर हव्य-कव्य को पितरों को प्राप्त करा देते हैं। यदि पितर देवयोनि में गया है तब दिया हुआ अन्न उसे वहां अमृत के रूप में प्राप्त होता है। पितर को मानव योनि में अन्न के रूप में, पशुयोनि में तृण के रूप में, सर्पादि योनियों में वायु रूप में, यक्षयोनि में पान रूप में श्राद्ध प्राप्त होता है। अन्य योनियों में भी उसे श्राद्धीय वस्तु भोगजनक तृप्तिकर पदार्थों के रूप में प्राप्त होकर अवश्य ही तृप्तिकारक होता है। नाम, गोत्र, हृदयकी श्रद्धा एवं उचित संकल्पपूर्वक दिए गए पदार्थों को भक्तिपूर्वक उच्चरित मन्त्र उनके पास पहुंचा देता है। चाहे वह जीव सैकड़ों योनियों को क्यों न पार कर गया हो।
सामान्यतः श्राद्ध की दो प्रक्रिया है—
१- पिण्डदान, २- ब्राह्मण भोजन।
शास्त्रवचन अनुसार ब्राह्मण मुख से देवता हव्य को और पितर कव्य को खाते हैं। पितर अपने कर्मवश अंतरिक्ष मे वायवीय शरीर धारण करके वास करते हैं। श्राद्ध काल मे आवाहन होने पर श्राद्ध के निमित्त निमन्त्रित ब्राह्मण में पितर स्वयमेव आरोपित होकर प्राणवायु की भांति सभी भोग प्राप्त कराते हैं। पश्चात सन्तुष्टि होने पर श्राद्धकर्म करने वाले के लिए कल्याणकारी हो जाते हैं।.. क्रमशः.. सब भगवत्कृपा






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