धार्मिक असहिष्णुता के मूल में है अज्ञानता ---सन्त ज्ञानेश्वरजी

लखीमपुर खीरी , 146

लखीमपुर/ प्रयागराज।

प्लॉट नं 36 सेक्टर 2 स्थित सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के पण्डाल में सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस से तत्त्वज्ञान प्राप्त महात्मा कमल जी ने सत्संग में सुनाया कि धर्म के नाम पर साम्प्रदायिक तनाव एवं टकराव की जो स्थिति आज समाज में दिखाई पड़ती है, उसका मूल कारण है आध-अधूरे एवं मिथ्या-अक्षम और काल्पनिक ज्ञान पद्धति का लागू किया जाना। अतः जब तक भगवान श्री विष्णु जी, भगवान श्री राम जी एवम भगवान श्री कृष्ण जी वाला ही तत्त्वज्ञान अर्थात ‘सम्पूर्ण ज्ञान-विधान’ को धरती पर सैद्धान्तिक, प्रायौगिक और व्यावहारिक तीनों रूपों में प्रभावी से प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया जायेगा तब तक धर्म-नाम सम्प्रदायों में समभाव का होना वैचारिक और भाषणीय व्याख्यान मात्र ही रहेगा । 
इस धरती पर समय-समय पर महापुरुषों, अंशावतारियों, रसूलों-पैगम्बरों, एण्जल्स-प्रॉफेट्स आदि उसी ‘एक’ सर्वोच्च शक्ति-सत्ता रूप खुदा-गॉड-भगवान द्वारा इस धरती पर भेजे जाते रहे हैं जो परिस्थिति के अनुसार जन समाज को उस सर्वोच्च शक्ति-सत्ता के तरफ मोड़ते रहे हैं । उन महापुरुषों द्वारा विभिन्न भाषाओं में एवं विभिन्न समयों में विभिन्न शब्दों से उस एक ही परमपुरुष रूप सर्वोच्च शक्ति-सत्ता को पुकारा जाता रहा है । परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गॉड- भगवान-सत्सीरी अकाल  ॐकार-सत्पुरुष-परमपुरुष-अकालपुरुष-बोधिसत्त्व-अरिहंत, यहोवा-अहूरमजदा-कुलमालिक आदि-आदि शब्दों से उसी परमप्रभु रूप सर्वोच्च शक्ति-सत्ता के तरफ इंगित किया जाता है । वह है एकमात्र ‘एक’ ही, इसीलिये ‘एकत्त्व’ वाला भी वास्तव में वह ही है । प्रॉफेट्स-पैगम्बर-अंशावतारी आदि उसी ‘एक’ का बनने और बने रहने की बातें समाज में रखते हैं किन्तु आज समाज उनके बताये गये विधानों को न अपनाकर अर्थात् उस ‘एक’ खुदा-गॉड-भगवान का न बनकर प्रॉफेट्स-पैगम्बर-अंशावतारियों अथवा गुरुजनों मात्र का बनकर पृथक्-पृथक् एक-एक वर्ग-सम्प्रदाय बनाते हुये अज्ञानतावश अलगाववाद का रूप कायम करके एकत्त्व वाले धर्म को अनेकत्त्च या बहुत्त्व में बिखेर दिया गया ।  अब यदि वे अपने अपने बडप्पनबाजी में तनाव-टकराव पैदा करते है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है और यदि सरकार भाई-चारा और शान्ति-व्यवस्था लाने में लिये अपने सारे प्रयास को विफल हुआ पा रही हो तो इसमें कोई अनहोनी बात नहीं है । 
  यह स्थिति हो गयी है आज के विश्व समाज की । ये सभी जुट गये हैं अपने-अपने बडप्पन और श्रेष्ठत्त्व को उजागर करने में । तनाव, टकराव व संघर्ष या विघटन ऐसे ही बडप्पनबाजी का ही तो परिणाम है । 
महात्मा जी ने अयोध्या में श्री राम जी की मूर्ति स्थापना करने के लिए सरकार को धन्यवाद देते हुए कहा की ज्ञानवापी और मथुरा में भी सरकार को शीघ्रातिशीघ्र ऐसा ही कदम बढ़ाना चाहिए यही भगवद इच्छा भी है । उन्होंने कहा केवल इतना ही नहीं अगर सरकार धर्म के नाम पर व्याप्त संघर्ष और टकराव मिटाना चाहता है तो भगवान श्री विष्णु जी श्री राम जी श्री कृष्ण जी द्वारा प्रदत्त संपूर्ण ज्ञान अर्थात तत्त्वज्ञान अर्थात TRUE SUPREME AND PERFECT KNOWLEDGE अर्थात खुदाई इल्म अर्थात प्राचीन भारतीय विद्यातत्त्वम पद्धति को विद्यालयों में लागू करना होगा जिस से जन समाज की दृष्टि में परिवर्तन होगा और ये भेदभाव समाप्त होगा।

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