तर्पण तथा पिंडदान के लिए पितृपक्ष का विशेष महत्व है, गया परिक्षेत्र से विश्वकांत त्रिपाठी
लखीमपुर खीरी Sep 28, 2026 at 07:32 PM , 1 गया बिहार। गया परिक्षेत्र मे सदियों से पितृ पक्ष मेला अश्वनि (क्वार) पूर्णिमा से अमावस्या का आयोजन होता आया है, यह मेला 26 सितंबर शनिवार से चलकर 10 अक्टूबर तक चलेगा,मृत्यु के बाद मोक्ष, मोक्ष के बाद स्वर्ग की प्राप्ति प्रत्येक प्राणी की अभिलाषा रही है, इसी अभिलाष को लेकर मृत्यु के पश्चात मृत प्राणी के परिजन गरुड़ पुराण में बताई गई व्यवस्था के अनुसार अपने पूर्वजों के मोक्ष की कामना से तर्पण तथा पिंडदान करते हैं, गरुड़ पुराण में व्यवस्था बताई गई है नदियों या सरोवर में अस्थियां प्रवाहित करने के बाद प्रयागराज से शुरू हुआ क्रम का बद्रीनारायण में समापन होता है।
इसी क्रम में बिहार प्रदेश के गया जनपद
परिक्षेत्र स्थित प्रेतशिला नामक स्थान है,जिसके बारे में मान्यता है कि इस स्थान पर पिंडदान करने से अकाल मृत्यु से,लड़कर, दुर्घटना का शिकार हुये मृतकों (पितरों) को मुक्ति मोक्ष मिलता है।,यह स्थान 45 बेदियों में से प्रमुख स्थान रखता है,धार्मिक मान्यताओं और गरुड़ पुराण के अनुसार, गया जी को मोक्ष की भूमि माना जाता है, यहाँ की सभी 45 वेदियों में प्रेतशिला पर्वत का एक विशेष और अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। गरुण पुराण में मान्यता है कि अकाल मृत्यु से मुक्ति यदि परिवार में किसी सदस्य की अकाल मृत्यु (जैसे दुर्घटना, आत्महत्या, डूबना या जलने) हुई हो, तो उनकी आत्मा 'प्रेत योनि' में भटकती रहती है। प्रेतशिला वेदी पर पिंडदान करने से ऐसी भटकती आत्माओं को प्रेत योनि से तुरंत मुक्ति मिलती है और वे ब्रह्मलोक/विष्णुलोक को प्राप्त होती हैं।
विशेष अनुष्ठान: प्रेतशिला पहाड़ की चोटी पर एक विशेष शिला (चट्टान) है, जहाँ भगवान ब्रह्मा के पदचिह्न हैं,यहाँ पितरों की आत्मा की शांति के लिए जौ के आटे या चावल का पिंड अर्पित किया जाता है,यह दो बेदियों पर वैदिक विधान से योग्य आचार्यों के निर्देशन में पूजन करा सत्तू उड़ाने,तथा सात सौ सीढ़ियों के ऊपर पहाड़ पर चढ़ कर सत्तू की भी परंपरा है,गया जी में अमूमन तीन प्रमुख जगहों पर पिंडदान सबसे अनिवार्य माना जाता है—फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर और अक्षयवट। परंतु अकाल मृत्यु वाले पितरों के उद्धार के लिए प्रेतशिलातथा राम शिला पर श्राद्ध कर्म करना विशेष फलदायी और आवश्यक माना जाता है।4 से 6 घंटे का समय लगता है इसमें मुख्य वेदियों के साथ-साथ प्रेत शिला. रामकुंड और अन्य प्रमुख कुंडों पर श्राद्ध किया जाता है पितृ पक्ष के दौरान. पारंपरिक रूप से प्रेत शीला में पिंडदान से पितरों को प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है उन्हें ब्रह्म लोक की प्राप्ति होती है नाम है प्रेत शिला इसी में भगवान ब्रह्मा का चरण है का चिन्ह है।गया जी में पिंडदान कैसे करें? पूरी विधि, वेदियां
पितृपक्ष स्वयं 15 दिनों का धार्मिक पक्ष है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर श्रद्धालु को पूरे 15 दिन गया में रहकर पिंडदान करना ही होगा। 2026 के पितृपक्ष की अवधि 2 गया जी में तीसरे दिन करीब एक लाख श्रद्धालुओं ने किया पिंडदान, प्रेतशिला पर गया जी में तीसरे दिन लगभग डेढ़ लाख श्रद्धालुओं ने पिंडदान कर अपने पूर्वजों का नमन किया,इस मौके पर प्रेतशिला पर भारी भीड़ और उहापोह की स्थिति रही गया प्रशासन की तरह से चाक चौबंद इंतजाम किए गए।






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