पलिया नगरपालिका में भ्रष्टाचार की खबर पर एफआईआर से गर्माया मामला प्रेस की स्वतंत्रता का मुद्दा; दो पर मुकदमा दर्ज
लखीमपुर खीरी Sep 19, 2026 at 02:53 PM , 8(विश्वकांत त्रिपाठी)
पलिया कलां लखीमपुर खीरी। नगर पालिका परिषद पलिया कलां में व्याप्त भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को लेकर सोशल मीडिया पर खबर प्रसारित करने के मामले में पुलिस ने दो लोगों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज की है।
इस कार्रवाई के बाद जहां एक तरफ अध्यक्ष पक्ष ने छवि धूमिल करने का आरोप लगाया है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर पत्रकारिता की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक जवाबदेही को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है।
मामले का विवरण और कानूनी कार्रवाई,नगर पालिका अध्यक्ष श्रीमती लक्ष्मी देवी गुप्ता की तहरीर पर थाना पलिया में 14 सितंबर 2026 को FIR संख्या 0277 दर्ज की गई।
पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 353(2), 356(2), 352 और 351(3) के तहत जसपाल सिंह गोंहनिया तथा पत्रकार दिव्यांशु पांडेय के खिलाफ मामला दर्ज किया है।
शिकायत में कहा गया है कि राजनीतिक रंजिश के चलते पत्रकारिता की आड़ में भ्रामक खबरें प्रसारित कर अध्यक्ष की छवि धूमिल करने की कोशिश की गई।
विवाद का विषय: 23 जुलाई 2026 को मोहल्ला किसान-2 स्थित शिव मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए स्वीकृत धनराशि के उपयोग को लेकर उच्च अधिकारियों को शिकायती पत्र दिया गया था, प्रशासनिक स्पष्टीकरण: अधिशासी अधिकारी (EO) ने 23 जुलाई को ही स्पष्ट किया था कि संबंधित स्वीकृत राशि अभी पालिका को प्राप्त नहीं हुई है। इसके बाद 3 अगस्त 2026 को जिलाधिकारी (DM) की ओर से धनराशि पालिका के खाते में हस्तांतरित करने हेतु संबंधित विभाग को पत्र भी जारी किया गया था।
पत्रकारिता की स्वतंत्रता बनाम विधिक प्रक्रिया
इस मामले ने स्थानीय स्तर पर मीडिया की भूमिका और कानूनी सीमाओं के संतुलन पर सवाल खड़े कर दिए हैं: संवैधानिक अधिकार: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्रेस को लोकतंत्र का अहम हिस्सा माना है, जहां जनप्रतिनिधियों व संस्थाओं से सवाल पूछना कानूनन मान्य है।
* विधिक सीमाएं: कानून जानकारों का मानना है कि पत्रकारिता कानून से ऊपर नहीं है। भ्रामक या मानहानिकारक सामग्री पर विधिक कार्रवाई का प्रावधान है, लेकिन प्रशासनिक काम-काज पर सवाल उठाना अपने आप में अपराध नहीं है।
* निष्पक्ष जांच की जरूरत: विशेषज्ञों के अनुसार, FIR दर्ज होना किसी के दोषी होने का अंतिम प्रमाण नहीं है और न ही केवल खबर छपने से आरोप सिद्ध होते हैं। दोनों का निर्धारण तथ्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होता है।
स्थानीय निकायों (नगर पालिका, पंचायत, तहसील) के टेंडर, निर्माण कार्य और सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए मीडिया की निगरानी आवश्यक मानी जाती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों और पत्रकारों, दोनों से ही संविधान व कानून के दायरे में जिम्मेदार आचरण की अपेक्षा की जाती है।






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