बाल श्रम अभिशाप से कम नहीं और वह भी भारत जैसे देश में

लखीमपुर खीरी , 10

नरेंद्र मिश्र मैगलगंज

मैगलगंज खीरी।ऐसे विश्व का निर्माण करना है, जहां काम नहीं, किताबें बच्चों का अधिकार हों।बाल श्रम के खिलाफ हर वर्ष अभियान चलाए जाते हैं, सेमिनार आयोजित होते हैं, जागरूकता रैलियां निकलती हैं और सरकारी आंकड़ों में बड़ी-बड़ी उपलब्धियां भी दिखाई जाती हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज भी अनेक मासूम बच्चे स्कूल की किताबों के बजाय मजदूरी के बोझ तले अपना बचपन बिताने को मजबूर हैं। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय है।मैगलगंज खीरी सहित देश के विभिन्न हिस्सों में आज भी चाय की दुकानों, ढाबों, गैराजों, कारखानों, ईंट-भट्टों, खेतों और घरेलू कामकाज में बच्चों को काम करते देखा जा सकता है। दुखद पहलू यह है कि संबंधित विभाग और जिम्मेदार अधिकारी सब कुछ देखते हुए भी अक्सर आंखें मूंदे रहते हैं। कई बार बाल श्रम विरोधी अभियान केवल कागजों तक सीमित दिखाई देते हैं।बाल श्रम एक ऐसी गंभीर सामाजिक समस्या है, जो बच्चों से उनका बचपन, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुनहरा भविष्य छीन लेती है। जो बच्चे पढ़-लिखकर अपने जीवन को नई दिशा दे सकते हैं, वे आर्थिक मजबूरियों और सामाजिक परिस्थितियों के कारण श्रम के दलदल में फंस जाते हैं। परिणामस्वरूप उनका शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास प्रभावित होता है तथा उनके सपने अधूरे रह जाते हैं।अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार आज भी दुनिया भर में करोड़ों बच्चे बाल श्रमिक के रूप में कार्य कर रहे हैं, जिनमें से बड़ी संख्या खतरनाक परिस्थितियों में काम करने को विवश है। यह स्थिति विकास और आधुनिकता के दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।बाल श्रम की समस्या की जड़ में गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, सामाजिक असमानता तथा कानूनों का कमजोर क्रियान्वयन प्रमुख कारण हैं। जब परिवार अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने में असमर्थ होते हैं, तब बच्चों को मजदूरी के लिए भेजना उनकी मजबूरी बन जाता है। लेकिन यह मजबूरी बच्चों के भविष्य को अंधकारमय बना देती है।सरकार द्वारा सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय बाल श्रमिक परियोजना और विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन इन योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना आवश्यक है। केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। समाज, अभिभावकों, शिक्षकों, स्वयंसेवी संगठनों और प्रशासन को मिलकर इस दिशा में गंभीरता से कार्य करना होगा।आज आवश्यकता है व्यापक जनजागरण की। हर नागरिक का यह नैतिक दायित्व है कि वह किसी भी बच्चे को मजदूरी करते देखे तो उसकी शिक्षा और संरक्षण के लिए आगे आए। बच्चों के हाथों में औजार नहीं, किताबें होनी चाहिए; उनके चेहरे पर थकान नहीं, सपनों की चमक होनी चाहिए।यदि हम वास्तव में विकसित भारत का सपना देखते हैं, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी बच्चा अपने बचपन से वंचित न रहे। प्रत्येक बच्चे को सुरक्षित, स्वस्थ, शिक्षित और सम्मानजनक जीवन का अधिकार मिले। तभी हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर पाएंगे जहां सच मायनों में "काम नहीं, किताबें बच्चों का अधिकार" होंगी।

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