अदभुत अश्वत्थामा : एक शापित योद्धा
परिवेश Nov 06, 2020 at 11:25 PM , 1466अमरेन्द्र सहाय अमर
अश्वत्थामा महाभारत के एक ऐसे किरदार है जिनकी कहानी रहस्यों में लिपटी है. यह कौरव सेना के एक अदभुत, महान और विलक्षण योद्धा थे. ऐसा कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध में 18 योद्धा जीवित बचे थे उनमे से एक अश्वत्थामा थे. पांडव अश्वत्थामा को हरा नही सके थे न ही मार सके थे. यह जन श्रुति है कि अश्वत्थामा आज भी जीवित और अमर है. कहा जाता है कि अश्वत्थामा ने जन्म लेते ही अश्व के समान घोर शब्द किया था जो दशो दिशाओ और आसमान में गूँज उठा था. शायद इसी से इस बालक का नाम अश्वत्थामा रखा गया. अश्वत्थामा का बचपन घोर अभावों में गुज़रा. अश्वत्थामा के जन्म के बाद गुरु द्रोण पर काफी विपन्नता आ गई. इस विपन्नता को दूर करने के लिए द्रोण परशुराम के पास विद्या प्राप्त करने के लिए चले गए. जब द्रोंण परशुराम के पास से शिक्षा लेकर लौटे तो उनके घर में एक गाय तक न थी. अन्य ऋषि कुमार को गाय का दूध पीता देख अश्वत्थामा दूध पीने के लिए रोता था. एक दिन अश्वत्थामा की माँ ने आटे का घोल बनाकर दूध कह कर पिला दिया तो अश्वत्थामा बहुत खुश हुआ. अबोध बालक को आटे का घोल कर दूध समझ पीना और खुश होना द्रोणाचार्य को हृदय तक आहत कर गया. द्रोण ने जब अश्वत्थामा की यह अवस्था देखी तो इसके लिए स्वयं को ज़िम्मेदार माना. वे गाँव गाँव गाय के लिए भटके परन्तु उन्हें गाय नहीं मिली. तब वे अपने सहपाठी राजा द्रुपद के दरबार में में गये जहाँ राजा द्रुपद ने उन्हें तिरस्कृत कर राजदरबार से निकाल दिया. राजा द्रुपद से अपमानित होने के बाद अश्वत्थामा को लेकर द्रोण कुरु राज्य में हस्तिनापुर आ गये. वे कुरु कुमारों को अस्त्र शस्त्र की शिक्षा देने लगे. यहाँ कृपाचार्य पहले से कुरु कुमारों को शिक्षा देते थे. कृपाचार्य द्रोणाचार्य के रिश्तेदार भी थे . द्रोणाचार्य भी इनके साथ कुरु कुमारों को शिक्षा देने लगे. बाद में द्रोणाचार्य कौरवो और पांडवों के आचार्य बन गये और बहुत प्रसिद्ध भी हो गये .
अश्वत्थामा जीवन के संघर्ष की अग्नि में तप कर सोना बने थे. उन्होंने अपने पिता द्रोणाचार्य से धनुर्वेद के सभी रहस्यों की शिक्षा प्राप्त कर ली और उच्चकोटि का धनुर्धर बन गया. अश्वत्थामा के ब्रह्मतेज, वीरता, धैर्य, शस्त्र ज्ञान, नीति ज्ञान बुद्धिमता आदि में बारे में किसी को कोई शंका नहीं थी. कौरव और पांडव दोनों अश्वत्थामा की शक्ति से परिचित थे. पितामह भीष्म स्वयं अश्वत्थामा की प्रसंशा करते थे.
जब भीम के राक्षस पुत्र घटोत्कच के नेतृत्व में पांडवों के सेना ने कौरव पर आक्रमण किया तो सभी कौरव पुत्र और सेना भाग खडी हुई तब अश्वत्थामा ने अकेले घटोत्कच और उसकी सेना से मोर्चा लिया. इन्होने घटोत्कच के पुत्र अंजन वर्मा को मृत्यु की गोद सुला दी. पांडवों की अक्षोहिणी सेना को मार गिराया. अश्वत्थामा ने घटोत्कच तक को घायल कर दिया. अश्वत्थामा के युद्ध कौशल को देखते हुए पांडव सेना में भय छा गया.
अश्वत्थामा कौरव सेना के प्रधान महारथी थे. पितामह भीष्म के शर शैया पर लेटने के बाद युद्ध के ग्यारहवें दिन कर्ण के परामर्श पर गुरू द्रोणाचार्य को कौरव सेना का प्रधान सेनापति बनाया जाता है. तब मामा शकुनि और दुर्योधन गुरु द्रोणाचार्य को कहते हैं कि अगर वे युधिष्ठर को बंदी बना लें तो युद्ध अपने आप समाप्त हो जायेगा. जब युद्ध के अंत में द्रोणाचार्य युद्धिष्ठिर को युद्ध में परास्त कर उन्हें बंदी बनाने चलते हैं तो अर्जुन आकर वाणों की वर्षा से द्रोणाचार्य को रोक देता है . इस प्रकार द्रोणाचार्य की युधिष्ठिर को बंदी बनाने की कोशिश नाकाम हो गई. लेकिन द्रोणाचार्य और अश्वत्थामा की संहारक शक्ति के चलते पांडव सेना की बहुत क्षति हुई. पांडवों की हार को देखते हुए श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को छल का सहारा लेने का परामर्श दिया परन्तु युधिष्ठिर मिथ्या कथन को तैयार नही थे. तब अवान्तिराज के हाथी जिसका नाम अश्वत्थामा था उसका भीम ने बध कर दिया और युद्ध में यह अफवाह फैला दी गई कि अश्वत्थामा मारा गया. जब गुरु द्रोणाचार्य ने अश्वत्थामा के मृत्यु की सत्यता युधिष्ठिर से जाननी चाही तो युधिष्ठिर ने कहा अश्वत्थामा तो मारा गया परन्तु हाथी. श्रीकृष्ण ने उसी समय शंखनाद कर दिया जिसके शोर के कारण द्रोणाचार्य अंतिम शब्द हाथी नही सुन पाए और उन्हें लगा कि उनका पुत्र मारा गया. यह सुनकर उन्होंने शास्त्र का त्याग कर दिया. इस मौके का लाभ उठाते ही द्रौपदी के भाई दृष्टदयुम्न ने अपनी तलवार से गुरु द्रोणाचार्य का सिर काट दिया. यह समाचार अश्वत्थामा के लिए बहुत दुखद था. अपने पिता की छलपूर्वक हत्या से अश्वत्थामा युद्ध के सारे नियमों को ताक में रख कर पांड्वो से युद्ध करता है. पिता की छ्ल द्वारा हत्या से दुखी होकर अश्वत्थामा विवश होकर नारायणाश्त्र का प्रयोग करता है जिसके चलते पूरी पांडव सेना नष्ट हो जाती लेकिन इसके इस अस्त्र से पांडवों को बचाने के लिए श्रीकृष्ण पांडवों को सलाह देते हैं कि सभी अपने अस्त्र और रथ त्याग कर नारायणाश्त्र के समक्ष आत्मसमर्पण कर दो अन्यथा कोई नहीं बचेगा. सभी पांडव ऐसा ही करते है और उस ब्रह्मास्त्र से सभी पांडव बच जाते हैं.
महाभारत युद्ध के अठारहवें दिन कौरव सेना के तीन योद्धा शेष बचते है . अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा. अश्वत्थामा पांड्वो के विनाश की हमेशा सोचता रहता था. आखिर में वह घोर कालरात्रि में पांडवों के शिविर में घुस जाता है और पांडवों के पांचो पुत्रो को पांडव समझ कर उनका सिर काट देता है. तभी दृष्टदयुम्न जाग जाता है तो अश्वत्थामा उसका भी बध कर देता है. अश्वत्थामा से इस कुकृत्य के हर तरफ निंदा की जाती है. अपने पुत्रो के बध से मर्माहत द्रौपदी विलाप करती है. तब अर्जुन अश्वत्थामा का बध करने का संकल्प लेकर उसका पीछा करते हैं. अर्जुन के संकल्प को सुन अश्वत्थामा भाग निकलता है. जब अश्वत्थामा को कहीं सुरक्षा नही मिलती तो वह अर्जुन पर ब्रहमास्त्र का प्रयोग कर देता है. यह देख कर अर्जुन भी ब्रम्हास्त्र का प्रयोग करते है. सृष्टि के विनाशा के भय से ऋषि मुनि अर्जुन से ब्रहमास्त्र को वापस लेने का अनुरोध करते हैं जिसे अर्जुन मान लेते है लेकिन अश्वत्थामा अपना ब्रहमास्त्र अभिमन्यु की विधवा की तरफ मोड़ देता है .लेकिन श्रीकृष्ण अपने प्रभाव से उत्तर को बचा लेते हैं. अर्जुन जीवित ही अश्वत्थामा को बंदी बनाकर द्रौपदी के समक्ष प्रस्तुत किया. बंदी और बंधे अश्वत्थामा को देख कर द्रौपदी को दया आ जाती है और द्रुपदी ने अर्जुन से कहा ,हे आर्यपुत्र अश्वत्थामा ब्राह्मण और गुरुपुत्र है. आपने इसके पिता से अस्त्र शास्त्र की विद्या पाई है. इस समय आप यह कल्पना कीजिये अपने पुत्र के रूप में गुरु द्रोणाचार्य आपके समक्ष खड़े हैं. इसका बध करने से इसकी माता कृपी भी शोकाकुल होगी. पुत्र मोह के कारण वह द्रोणाचार्य के साथ सती नहीं हुई. इसका बध करने से कृपी की आत्मा मुझे कोसेगी. इसके बध से मेरे पुत्र तो वापस नही आयेंगे . अत: आप इसे मुक्त कर दें. द्रौपदी के धर्म युक्त बातों को सुन कर सभी ने द्रौपदी कि सराहना की. अर्जुन ने दंड देने की नीयत से अश्वत्थामा के केश काट दिए और उसके मस्तक की मणि तलवार से निकाल दी. कहते हैं श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को छ हजार साल तक भटकने रहने का शाप दिया. जनश्रुति है अश्वत्थामा आज भी कभी मध्प्रदेश तो कभी उडीसा और कभी उत्तरखंड के जंगलों के भटक रहा है. कहते है अश्वत्थामा इस कल्प के अंत तक जीवित रहेगा.
महाभारत की गाथा का एक महत्वपूर्ण पात्र होने के बावजूद अश्वत्थामा सदा उपेक्षित रहा है. पौराणिक आख्यानों में ऐसे कई लोग हैं जिन्हें अमर माना जाता है. लेकिन अन्य लोगों को जहां अमरता वरदान के रूप में मिली तो अश्वत्थामा को 'शाप' के रूप में.































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