महिला सुरक्षा व सम्मान का मिशन शक्ति क्यों ना महिला शिक्षकों से शुरू किया जाए
परिवेश Oct 21, 2020 at 08:05 AM , 727*समाज में गरिमा एवं सम्मान का भाव पैदा करने वाला एकमात्र सक्षम व्यक्ति शिक्षक ही है, परंतु हमारे समाज एवं शासन तंत्र ने शिक्षकों की जो है दुर्दशा कर रखी है उससे शिक्षक कभी भी समाज को सही दिशा देने की स्थिति में नहीं है। जब तक शिक्षक को उसका आत्मसम्मान, सामाजिक गौरव और प्रतिष्ठा नहीं लौटायी जाएगी , उसे समाज में सम्मान पूर्वक प्रतिष्ठापित नहीं किया जाएगा तब तक समाज के किसी भी वर्ग की ( महिला सहित) गरिमा की स्थापना मेरी समझ से असंभव ही है। नारी सम्मान में आई गिरावट की एक वजह यह भी है शिक्षा का स्तर और शिक्षक का सम्मान पतित कर दिया गया है। शिक्षक समाज को नैतिकता का उच्च आदर्श दिखाने एवं समझाने की स्थिति में ही नहीं रह गया है। उसका सम्मान स्वयं खतरे में है ,आए दिन शिक्षा विभाग में कार्यरत छोटे से बड़े अधिकारी के सामने उसे गलत और चोर सिद्ध से करने में लगे रहते हैं इसमें मीडिया की भी महती भूमिका है। अभी जल्दी हमने लखनऊ में वित्त एवं लेखाधिकारी महोदय द्वारा महिला शिक्षिका से अभद्रता का प्रकरण देखा है जिसमें जिले के वित्त संबंधित उच्च पद पर बैठे हुए इन पदाधिकारी महोदय ने महिला शिक्षिका के लिए इस औरत और सड़क छाप जैसे शब्दों का प्रयोग किया था जो की शिक्षक की गरिमा और सम्मान के खिलाफ है, इस तरह अपने हक और अधिकार की बात करने पर अपमान शिक्षक सहेगा तो वह भावी नागरिकों को एक दूसरे का सम्मान करना कैसे सिखा सकता है? यदि शिक्षा व्यवस्था एवं शिक्षकों के सम्मान का पुनर्स्थापन समाज में नहीं होता है तो समाज आगे अन्य भी अनेक विसंगतियां से ग्रस्त होना पडेगा। समाज का सुधार किसी भी पुलिसिंग व्यवस्था या कानून की सक्षमता बृद्धि से नहीं हो सकता है। यह हमें जितना जल्दी समझ में आ जाएगा उतना जल्दी ही हम अपने समाज को बेहतर समाज बनाने की तरफ अग्रसर हो पाएंगे।*
*आइए मिलकर हम सब संकल्प लेते हैं कि मिशन शक्ति के इन 180 दिनों में हम अपने शिक्षकों का सम्मान करेंगे तथा उन्हें गरिमा मय जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित करेंगे तथा इस बात के लिए उन्हें प्रोत्साहित करेंगे कि वह अपनी कक्षा में नैतिकता, समानता और अपनी कक्षा में पढ़ने वाले बालक और बालिकाओं को एक दूसरे का सम्मान करने की शिक्षा दे सकें*
*हम ऐसे समाज में रहते हैं जहां पिता की इज्जत बेटी के हाथों में और पिता की सम्पत्ति बेटों के हाथों में रहती है क्या इस असमानता को खत्म नहीं किया जा सकता ? निश्चित रूप से हमें अपने समाज में मानसिकता को बदलने का काम जमीनी स्तर से शुरू करना होगा और इसका एक मात्र सूत्रधार शिक्षक ही हो सकता है*
*रीना त्रिपाठी*































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